Shattila Ekadashi 2026 Date: खिचड़ी और चावल के दान को लेकर उलझे भक्त, जानें क्या कहता है शास्त्र…
Shattila Ekadashi 2026 Date: भारतीय पंचांग और खगोलीय गणना के अनुसार इस बार एक अत्यंत दुर्लभ स्थिति बन रही है। माघ मास की षटतिला एकादशी और मकर संक्रांति का महापर्व एक ही दिन पड़ रहे हैं। इस खास अवसर पर (Hindu Panchang alignments) सूर्य देव धनु राशि का परित्याग कर मकर राशि में प्रवेश करेंगे, जिसे उत्तरायण की शुभ शुरुआत माना जाता है। संक्रांति और एकादशी का यह मिलन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से बहुत फलदायी है, लेकिन यह भक्तों के मन में एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर रहा है।

चावल के दान और एकादशी के नियम का गहरा द्वंद्व
मकर संक्रांति पर सदियों से चावल और दाल की खिचड़ी का दान करने और इसे खाने की परंपरा रही है। वहीं दूसरी ओर, षटतिला एकादशी के दिन (religious dietary restrictions) शास्त्रों में चावल का स्पर्श और सेवन पूरी तरह वर्जित माना गया है। ऐसे में लोग इस उलझन में हैं कि संक्रांति का उत्सव मनाएं या एकादशी की मर्यादा रखें। विद्वानों का मत है कि चूंकि संक्रांति 14 जनवरी की दोपहर को लग रही है और यह 15 जनवरी तक प्रभावी रहेगी, इसलिए नियमों का पालन करना अनिवार्य है।
संक्रांति का दान और उदयातिथि का विशेष महत्व
ज्योतिषीय गणना के अनुसार, संक्रांति का प्रभाव 14 जनवरी की दोपहर से शुरू होगा, लेकिन हिंदू धर्म में उदयातिथि का विशेष मान होता है। इसी कारण से (donation and charity) बहुत से श्रद्धालु संक्रांति से संबंधित दान-पुण्य और खिचड़ी का वितरण अगले दिन यानी 15 जनवरी को करेंगे। ऐसा करने से एकादशी के दिन चावल से परहेज करने का नियम भी सुरक्षित रहेगा और संक्रांति के पुण्य लाभ में भी कोई कमी नहीं आएगी।
षटतिला एकादशी तिथि और पारण का सही समय
इस वर्ष षटतिला एकादशी 14 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी। तिथि का आरंभ 13 जनवरी को दोपहर 3:17 बजे से हो जाएगा, जबकि इसका समापन 14 जनवरी की शाम 5:52 बजे होगा। जो भक्त इस कठिन व्रत का पालन कर रहे हैं, उन्हें (Vrat Parana timings) अपने उपवास का समापन 15 जनवरी की सुबह 7:15 से 9:21 बजे के बीच कर लेना चाहिए। द्वादशी तिथि 15 जनवरी की रात 8:16 बजे तक रहेगी, जिससे पारण के लिए पर्याप्त समय उपलब्ध रहेगा।
तिल के छह प्रयोगों से मिटेंगे जीवन के सारे दुख
षटतिला एकादशी का नाम ही इसके महत्व को उजागर करता है, जिसमें तिल का छह प्रकार से उपयोग करने का विधान है। मान्यता है कि इस दिन जो व्यक्ति तिल का दान करता है, भगवान विष्णु उसके सभी संचित पापों का नाश कर देते हैं। इस पवित्र दिन (spiritual purification process) मन, वाणी और कर्म की शुद्धि पर विशेष बल दिया जाता है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत का श्रद्धापूर्वक पालन करने वाले भक्त को जीवन के अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति होती है और दरिद्रता दूर भागती है।
ग्रहों की शांति के लिए दान की विशेष वस्तुएं
षटतिला एकादशी के दिन केवल तिल ही नहीं, बल्कि अन्य वस्तुओं का दान भी सौभाग्य लेकर आता है। काले तिल, गुड़, घी और नमक के साथ-साथ जाड़े के मौसम को देखते हुए गर्म कपड़े और कंबल का दान अत्यंत लाभकारी माना गया है। इन वस्तुओं के दान से (astrological planet peace) कुंडली के सभी अशुभ ग्रह शांत होते हैं और जातक को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। विशेषकर शनि और राहु के दोषों को दूर करने के लिए यह दिन सर्वश्रेष्ठ है।
दशमी युक्त एकादशी का त्याग और शास्त्रों की आज्ञा
व्रत के चयन में सबसे बड़ी सावधानी यह रखनी चाहिए कि एकादशी दशमी तिथि से दूषित न हो। शास्त्रों में स्पष्ट उल्लेख है कि (pure Ekadashi fasting) दशमी युक्त एकादशी का व्रत करने से पूर्व में अर्जित तीन जन्मों के पुण्य नष्ट हो सकते हैं। यदि द्वादशी तिथि अत्यंत सूक्ष्म हो, तभी ऐसी स्थिति में उपवास किया जा सकता है। गृहस्थों और साधु-संतों के लिए एकादशी चुनने के अलग-अलग नियम होते हैं, जिनका पालन करना आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य है।
उदयातिथि और द्वादशी का सूक्ष्म गणित
यदि एकादशी तिथि दिनभर दशमी से युक्त हो और अंत में द्वादशी का स्पर्श हो, तो अगले दिन ही व्रत करना उत्तम होता है। कभी-कभी ऐसी स्थिति बनती है जब (Vedic calendar calculations) एकादशी, द्वादशी और त्रयोदशी का संयोग एक ही रात में हो जाता है। ऐसी दुर्लभ स्थिति में त्रयोदशी में पारण करने पर बारह द्वादशियों के बराबर फल मिलता है। गृहस्थों को हमेशा विद्वानों से सलाह लेकर ही तिथि का निर्णय करना चाहिए ताकि उनके व्रत का पूर्ण फल प्राप्त हो सके।
विरक्त और गृहस्थों के लिए अलग-अलग नियम
पंचांग के अनुसार यदि शुक्ल या कृष्ण पक्ष में दो एकादशियां आ रही हों, तो नियम बदल जाते हैं। पहली एकादशी गृहस्थों के लिए श्रेष्ठ मानी गई है, जबकि दूसरी (ascetic lifestyle rules) विरक्त यतियों, साधुओं और विधवाओं के लिए मान्य होती है। षटतिला एकादशी पर इस सूक्ष्म भेद को समझना आवश्यक है क्योंकि इस दिन सूर्य का राशि परिवर्तन भी हो रहा है। नियमों का सही पालन ही ईश्वर की सच्ची कृपा का द्वार खोलता है।



