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Bihar Groundwater Nitrate Contamination 2026: 30 जिलों की आई शामत, मासूमों को निगल रहा है ब्लू बेबी सिंड्रोम

Bihar Groundwater Nitrate Contamination 2026: बिहार के लिए एक बेहद डरावनी और चिंताजनक खबर सामने आई है, जिसने पूरे राज्य के स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मचा दिया है। मुजफ्फरपुर सहित बिहार के 30 जिलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा खतरे के निशान को पार कर चुकी है। केंद्रीय भूजल बोर्ड की ताजा (Groundwater Quality Assessment) रिपोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि जिस पानी को हम जीवनदायिनी मानकर पी रहे हैं, वह दरअसल बीमारियों का घर बन चुका है। यह रिपोर्ट राज्य की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।

Bihar Groundwater Nitrate Contamination 2026
Bihar Groundwater Nitrate Contamination 2026

आर्सेनिक और नाइट्रेट ने बिगाड़ा पानी का खेल

सिर्फ नाइट्रेट ही नहीं, बल्कि मधुबनी और शिवहर जैसे जिलों में आर्सेनिक की मौजूदगी ने भी स्थिति को और अधिक भयावह बना दिया है। रिपोर्ट के अनुसार (Bihar Groundwater Nitrate Contamination 2026) की समस्या से फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियां होने का खतरा बढ़ गया है। लंबे समय तक ऐसा पानी पीने से आर्सेनिकोसिस जैसी बीमारी हो सकती है, जो इंसान के श्वसन तंत्र को पूरी तरह तबाह कर देती है। इससे लोगों को सांस लेने में तकलीफ होती है और धीरे-धीरे दम घुटने जैसा महसूस होने लगता है।


30 जिलों के माथे पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा

बिहार के जिन जिलों में नाइट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर की सुरक्षित सीमा से कहीं अधिक मिली है, उनमें राजधानी पटना, वैशाली, समस्तीपुर और सारण जैसे प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं। वैज्ञानिकों ने (Chemical Pollutants In Soil) के रिसाव को इसका मुख्य कारण माना है। जांच के दौरान लिए गए कुल 584 नमूनों में से लगभग 13 प्रतिशत से अधिक सैंपल फेल पाए गए हैं, जो यह दर्शाते हैं कि राज्य का एक बड़ा हिस्सा प्रदूषित पानी पीने को मजबूर है।


मासूमों को अपनी चपेट में ले रहा ब्लू बेबी सिंड्रोम

भूजल में नाइट्रेट की अधिकता का सबसे दर्दनाक असर छह माह से कम उम्र के बच्चों पर पड़ रहा है। डॉक्टरों के अनुसार (Blue Baby Syndrome Symptoms) में बच्चों के होंठ, त्वचा और नाखून नीले पड़ने लगते हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जहां शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह बाधित हो जाता है। चिकित्सा जगत में इसे मेथेमोग्लोबिनेमिया कहा जाता है, जो बच्चों के विकास को रोक देता है और समय पर इलाज न मिलने पर यह जानलेवा भी साबित हो सकता है।


खून में ऑक्सीजन सोख रहा है यह जहरीला तत्व

एसकेएमसीएच के विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि जब नाइट्रेट शरीर के भीतर जाता है, तो वह नाइट्राइट में बदल जाता है। यह रासायनिक बदलाव (Methemoglobinemia Health Risk) पैदा करता है, जिससे खून की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता काफी कम हो जाती है। इसके शुरुआती लक्षणों में बच्चों में अत्यधिक सुस्ती, कमजोरी और सांस लेने में कठिनाई देखी जाती है। माता-पिता को सलाह दी गई है कि वे अपने बच्चों के शरीर में होने वाले किसी भी नीलेपन को नजरअंदाज न करें।


इन जिलों के ग्रामीण इलाकों में स्थिति गंभीर

मुजफ्फरपुर के मोतीपुर डिवीजन सहित पश्चिमी और पूर्वी चंपारण जैसे जिलों में भी पानी की गुणवत्ता बेहद खराब पाई गई है। हालांकि (Public Health Engineering Department) के अधिकारियों का कहना है कि वे नियमित निगरानी और वर्षा जल संचयन के उपायों पर काम कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। विभाग तक अभी यह नई रिपोर्ट आधिकारिक रूप से नहीं पहुंची है, जिसकी वजह से बचाव कार्यों में देरी होने की आशंका बनी हुई है।


आर्सेनिकोसिस से फेफड़ों पर हो रहा है सीधा हमला

रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि आर्सेनिक युक्त पानी पीने से केवल बाहरी त्वचा ही नहीं, बल्कि शरीर के आंतरिक अंग भी प्रभावित हो रहे हैं। यह (Respiratory System Damage) का एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है। मधुबनी और शिवहर जैसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों में फेफड़ों की जकड़न और अस्थमा जैसे लक्षण तेजी से बढ़ रहे हैं। यह जहर धीमे-धीमे इंसान की जीवन प्रत्याशा को घटा रहा है, जो भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है।


सुरक्षा मानकों की अनदेखी पड़ रही है भारी

विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारतीय मानकों के अनुसार पानी में नाइट्रेट की मात्रा एक तय सीमा के भीतर होनी चाहिए। लेकिन (Water Safety Standards) की लगातार हो रही अनदेखी ने आज बिहार को इस मुकाम पर खड़ा कर दिया है। कृषि में रसायनों का अंधाधुंध प्रयोग और खराब ड्रेनेज सिस्टम भूजल को जहरीला बनाने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। यदि तुरंत ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली नस्लें शारीरिक रूप से बेहद कमजोर पैदा होंगी।


बचाव के लिए जल संरक्षण ही एकमात्र रास्ता

विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब हमें भूजल पर निर्भरता कम करनी होगी। (Rainwater Harvesting Techniques) को बढ़ावा देकर और जल स्रोतों को रिचार्ज करके ही हम पानी में घुले रसायनों की सांद्रता को कम कर सकते हैं। सरकार को चाहिए कि वह प्रभावित जिलों में तुरंत वाटर प्यूरीफिकेशन प्लांट लगाए और लोगों को जागरूक करे कि वे बिना जांच किए हुए चापाकल का पानी सीधे तौर पर न पिएं।


प्रशासन और समाज को मिलकर लड़नी होगी जंग

भूजल की गिरती गुणवत्ता केवल सरकारी समस्या नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक संकट है। हमें अपनी (Future Generation Protection) के लिए पानी के इस्तेमाल और उसके संरक्षण के तरीकों में बदलाव लाना होगा। मुजफ्फरपुर से लेकर पटना तक के लोगों को अब जल संकट के प्रति सजग होना पड़ेगा। सरकार को भी चाहिए कि वह इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेते हुए युद्ध स्तर पर सुधारात्मक उपाय शुरू करे, ताकि बिहार के बच्चों का भविष्य ‘नीला’ पड़ने से बचाया जा सके।

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