Tejaswi Yadav Political Future: शिवानंद तिवारी के तीखे सवालों के पीछे मौजूद है नफरत की आग, जानें क्यों…
Tejaswi Yadav Political Future: बिहार की राजनीति के क्षितिज पर इस वक्त एक अजीब सी बेचैनी तैर रही है। जब राष्ट्रीय जनता दल के युवराज तेजस्वी यादव सपरिवार छुट्टियां मनाकर पटना लौटे, तो नजारा वैसा नहीं था जैसा कभी लालू प्रसाद यादव के दौर में हुआ करता था। राजद के दिग्गज नेता शिवानंद तिवारी ने इस ओर इशारा करते हुए कहा कि हवाई अड्डे पर (party leadership vacuum) का आलम ऐसा था कि स्वागत के लिए कोई भी विधायक नजर नहीं आया। वहां कार्यकर्ताओं के नारों की गूंज के बजाय सिर्फ बाइट लेने के लिए खड़े मीडिया कैमरों की भीड़ थी, जो पार्टी के भीतर की अंदरूनी कलह को उजागर कर रही है।

सत्ता के गलियारों से दूर घर की ओर बढ़ते कदम
शिवानंद तिवारी की नाराजगी सिर्फ एयरपोर्ट तक सीमित नहीं थी, बल्कि उन्हें इस बात से भी ठेस पहुंची कि तेजस्वी पटना आने के बाद सीधे अपने घर चले गए। वह अपनी पार्टी के प्रदेश कार्यालय तक में झांकने नहीं गए, जिसे राजनीति के जानकार (political detachment) के तौर पर देख रहे हैं। तिवारी का मानना है कि एक नेता के लिए पार्टी दफ्तर मंदिर की तरह होता है, और वहां की अनदेखी करना किसी भी दृष्टिकोण से भविष्य के लिए अच्छा लक्षण नहीं माना जा सकता।
तेजस्वी का 100 दिनों का मौन व्रत और रणनीति
इधर आलोचनाओं के बीच तेजस्वी यादव ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि वह फिलहाल सकारात्मक राजनीति की राह पर चलना चाहते हैं। उन्होंने घोषणा की है कि वह नई सरकार के गठन के शुरुआती 100 दिनों तक उनकी नीतियों या कार्यक्रमों पर कोई (strategic silence) बनाए रखेंगे और सीधा हमला नहीं करेंगे। हालांकि, उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि वह जनता के बीच जाकर सरकार के कार्यों का आकलन और उनकी विवेचना निरंतर जारी रखेंगे ताकि विपक्ष की भूमिका कमजोर न पड़े।
लोक हारा और तंत्र जीता: हार का नया नैरेटिव
नए साल की शुभकामनाएं देते हुए तेजस्वी ने एक बार फिर बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों पर सवालिया निशान खड़े किए हैं। उनका कहना है कि आज पूरा देश मान रहा है कि बिहार में ‘लोक’ की हार हुई है और ‘तंत्र’ की जीत, जो चुनाव प्रक्रिया में (electoral transparency) की कमी की ओर इशारा करता है। तेजस्वी ने स्पष्ट किया कि उनकी हार असल में जनता का फैसला नहीं, बल्कि सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग का परिणाम है, जिसने लोकतंत्र की मूल भावना को चोट पहुंचाई है।
डबल इंजन सरकार पर वादों का भारी दबाव
तेजस्वी यादव ने अपनी खामोशी के बीच भी एनडीए सरकार को उसके वादों की याद दिलाना नहीं भुला। उन्होंने आरोप लगाया कि (governance failure) की वजह से राज्य में अपराध, भ्रष्टाचार और पलायन जैसे मुद्दे आज भी जस के तस बने हुए हैं। उन्होंने विशेष रूप से सरकार के उस वादे पर तंज कसा जिसमें प्रदेश की ढाई करोड़ महिलाओं को दो-दो लाख रुपये देने की बात कही गई थी, और मांग की कि सरकार अब अपने घोषणा पत्र को हकीकत में तब्दील करे।
शिवानंद तिवारी का पुराना दर्द और तीखे तंज
यह पहली बार नहीं है जब शिवानंद तिवारी ने तेजस्वी की कार्यशैली पर उंगली उठाई है; इससे पहले भी वह विधानसभा सत्र के दौरान तेजस्वी के विदेश जाने को लेकर हमलावर रहे हैं। उन्होंने साफ लहजे में कहा था कि तेजस्वी ने चुनावी मैदान छोड़ दिया है और उनमें अगले पांच वर्षों तक (opposition leader role) निभाने का धैर्य और क्षमता नहीं दिखती। तिवारी के ये शब्द राजद के उन पुराने निष्ठावान कार्यकर्ताओं की आवाज माने जा रहे हैं जो पार्टी के भविष्य को लेकर डरे हुए हैं।
कार्यकर्ता बनाम नेता: शिवानंद की नसीहत
फेसबुक पोस्ट के माध्यम से तिवारी ने राजनीति के गहरे दर्शन को साझा करते हुए कहा कि जय और पराजय जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन जीत या हार को स्वीकार करने का तरीका ही आपकी असल शख्सियत बताता है। उन्होंने तेजस्वी को सलाह दी कि उन्हें एक रसूखदार नेता की तरह व्यवहार करने के बजाय एक (ground level worker) की तरह लोगों से मिलना चाहिए। उनका मानना है कि जब तक नेता जमीन से नहीं जुड़ेगा, तब तक पार्टी में नई जान फूंकना नामुमकिन होगा।
क्या राजद के भीतर नेतृत्व परिवर्तन की सुगबुगाहट है?
शिवानंद तिवारी जैसे वरिष्ठ नेता का बार-बार सार्वजनिक रूप से बोलना यह संकेत देता है कि राजद के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। तेजस्वी की (internal party dissent) को संभालने की क्षमता अब दांव पर लगी है। यदि युवा नेतृत्व ने जल्द ही अपने पुराने दिग्गजों और कार्यकर्ताओं का विश्वास वापस नहीं जीता, तो बिहार की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी को बिखरने से रोकना मुश्किल हो सकता है। राजनीति में संवाद की कमी अक्सर बड़े साम्राज्यों के पतन का कारण बनती है।
बिहार की सियासत में ‘इंतजार और देखो’ की स्थिति
फिलहाल बिहार का राजनीतिक पारा भले ही गिर रहा हो, लेकिन राजद के भीतर की गर्मी लगातार बढ़ रही है। तेजस्वी का (policy of wait and watch) उन्हें फायदा पहुंचाएगा या उनके विरोधियों को और मजबूत करेगा, यह आने वाले कुछ महीने तय करेंगे। शिवानंद तिवारी की चेतावनियां तेजस्वी के लिए एक ‘वेक अप कॉल’ की तरह हैं, जिसे अनदेखा करना उनके राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है।



