AIWeightLoss – फिटनेस ऐप्स पर बढ़ती निर्भरता, क्या सुरक्षित है डिजिटल डाइट…
AIWeightLoss – तेजी से बदलती जीवनशैली में फिट और स्वस्थ रहने की चाहत पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। काम का दबाव, अनियमित दिनचर्या और समय की कमी के बीच अब बड़ी संख्या में लोग वजन घटाने के लिए मोबाइल ऐप्स और डिजिटल टूल्स का सहारा ले रहे हैं। कुछ क्लिक में तैयार डाइट प्लान, कैलोरी कैलकुलेशन और वर्कआउट शेड्यूल आसानी से मिल जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये तकनीकी साधन वास्तव में हर व्यक्ति की शारीरिक जरूरतों को समझ पाते हैं, या फिर यह सिर्फ एक सुविधाजनक विकल्प भर हैं?

डिजिटल फिटनेस का बढ़ता दायरा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित एप्लिकेशन अब वेलनेस इंडस्ट्री का अहम हिस्सा बन चुके हैं। कैलोरी ट्रैकिंग, स्टेप काउंट, पर्सनलाइज्ड डाइट प्लान और वर्चुअल फिटनेस कोच जैसी सुविधाएं लोगों को आकर्षित कर रही हैं। खासतौर पर युवा वर्ग और कामकाजी पेशेवर इन टूल्स को तेजी से अपना रहे हैं। कारण साफ है—समय की बचत और तुरंत परिणाम का वादा।
हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक उपयोगी जरूर है, लेकिन इसे अंतिम समाधान मान लेना सही नहीं होगा। सीके बिड़ला अस्पताल, दिल्ली की आंतरिक चिकित्सक डॉ. मनीषा अरोड़ा बताती हैं कि ये टूल्स जागरूकता बढ़ाने और अनुशासन बनाए रखने में मदद कर सकते हैं, परंतु इन पर पूरी तरह निर्भर होना उचित नहीं है।
AI टूल्स कैसे तैयार करते हैं डाइट प्लान
अधिकांश फिटनेस ऐप्स उपयोगकर्ता की उम्र, वजन, लंबाई, दैनिक गतिविधि, नींद और खानपान से जुड़ी जानकारी लेते हैं। इन आंकड़ों के आधार पर एल्गोरिदम दैनिक कैलोरी की जरूरत तय करता है और एक्सरसाइज रूटीन सुझाता है। कुछ ऐप्स नियमित फीडबैक भी देते हैं, जिससे प्रगति पर नजर रखी जा सके।
शोध बताते हैं कि लगातार ट्रैकिंग और जवाबदेही स्वस्थ आदतें विकसित करने में सहायक हो सकती हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि ये सुझाव सामान्य डेटा पर आधारित होते हैं। हर व्यक्ति का शरीर अलग तरीके से प्रतिक्रिया करता है, जिसे मशीन पूरी तरह समझ नहीं सकती।
चिकित्सकीय स्थितियों में सावधानी जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, थायरॉयड, पीसीओएस, डायबिटीज, हार्मोनल असंतुलन या हृदय रोग जैसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए डॉक्टर की सलाह अनिवार्य है। एल्गोरिदम कई बार बहुत कम कैलोरी या अत्यधिक कठिन व्यायाम की सलाह दे सकता है, जो सभी के लिए सुरक्षित नहीं होता।
ऐसी स्थिति में थकान, मांसपेशियों की कमजोरी, पोषक तत्वों की कमी या खानपान से जुड़ी गलत आदतें विकसित हो सकती हैं। इसलिए किसी भी डिजिटल डाइट प्लान को अपनाने से पहले स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना बेहतर कदम माना जाता है।
डेटा सुरक्षा पर भी उठते हैं सवाल
फिटनेस और हेल्थ ऐप्स उपयोगकर्ताओं की व्यक्तिगत और स्वास्थ्य संबंधी संवेदनशील जानकारी एकत्र करते हैं। ऐसे में डेटा प्राइवेसी एक महत्वपूर्ण मुद्दा बनकर उभरता है। कई बार लोग बिना शर्तें पढ़े ही ऐप डाउनलोड कर लेते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि किसी भी प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से पहले उसकी प्राइवेसी पॉलिसी ध्यान से पढ़ें और यह सुनिश्चित करें कि आपका डेटा सुरक्षित रखा जा रहा है।
तकनीक सहायक है, विकल्प नहीं
डॉ. मनीषा अरोड़ा का कहना है कि AI को डॉक्टर का विकल्प नहीं बल्कि सहायक उपकरण की तरह इस्तेमाल करना चाहिए। यदि किसी योग्य डाइटीशियन या फिटनेस विशेषज्ञ की देखरेख में इन टूल्स का उपयोग किया जाए तो यह प्रगति पर नजर रखने और अनुशासन बनाए रखने में मददगार साबित हो सकते हैं।
भविष्य में तकनीक मेटाबॉलिक हेल्थ की बेहतर समझ और बीमारियों की शुरुआती पहचान में भूमिका निभा सकती है। लेकिन स्थायी और सुरक्षित वजन घटाना संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और लंबे समय तक अपनाई गई स्वस्थ जीवनशैली पर ही निर्भर करता है। स्क्रीन पर बना प्लान सुविधाजनक जरूर हो सकता है, पर शरीर और मन के संतुलन की असली समझ अभी भी इंसानी अनुभव से ही आती है।



