स्वास्थ्य

Dementia – बदलती जीवनशैली से जुड़ता डिमेंशिया का बढ़ता खतरा

Dementia – डिमेंशिया को अक्सर बढ़ती उम्र की स्वाभाविक समस्या मान लिया जाता है, लेकिन हालिया शोध और विशेषज्ञों की राय इस धारणा को पूरी तरह सही नहीं ठहराती। अब यह साफ होता जा रहा है कि यह स्थिति केवल उम्र से नहीं, बल्कि लंबे समय से अपनाई जा रही जीवनशैली से भी गहराई से जुड़ी है। विशेषज्ञों के मुताबिक, कई मामलों में समय रहते सही आदतें अपनाकर डिमेंशिया के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

dementia risk linked to changing lifestyle

डिमेंशिया क्या है और क्यों होती है गलतफहमी

शारदा केयर हेल्थ सिटी के सीनियर डायरेक्टर और न्यूरोसाइंसेज प्रमुख डॉ. अतमप्रीत सिंह बताते हैं कि डिमेंशिया कोई एक बीमारी नहीं है। यह लक्षणों का एक समूह है, जिसमें याददाश्त कमजोर होना, सोचने-समझने में कठिनाई और निर्णय लेने की क्षमता में धीरे-धीरे कमी शामिल होती है। अल्जाइमर जैसी बीमारियां भी इसी श्रेणी में आती हैं। आमतौर पर लोग इसे उम्र का असर मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, जिससे समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए जा पाते।

रिसर्च क्या कहती है लाइफस्टाइल और जोखिम को लेकर

मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित अध्ययनों के अनुसार, डिमेंशिया के लगभग आधे मामलों में ऐसे जोखिम कारक पाए गए हैं, जिन्हें बदला या नियंत्रित किया जा सकता है। हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा, धूम्रपान और शारीरिक निष्क्रियता इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसके अलावा लंबे समय तक डिप्रेशन में रहना, सामाजिक रूप से अलग-थलग पड़ जाना और शिक्षा की कमी भी दिमागी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकती है।

सुनने की समस्या और प्रदूषण भी बढ़ाते हैं खतरा

शोध में यह भी सामने आया है कि सुनने की क्षमता में कमी और लगातार शोर या वायु प्रदूषण के संपर्क में रहना भी डिमेंशिया के जोखिम को बढ़ा सकता है। अत्यधिक शराब का सेवन दिमाग की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे मानसिक क्षमताएं धीरे-धीरे कमजोर होने लगती हैं। ये सभी कारक मिलकर लंबे समय में दिमाग पर गहरा असर डालते हैं।

दिमाग को स्वस्थ रखने वाली आदतें क्यों हैं जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि हमारा दिमाग भी शरीर के अन्य अंगों की तरह रोजमर्रा की आदतों पर निर्भर करता है। नियमित शारीरिक गतिविधि से रक्त संचार बेहतर होता है, जिससे मस्तिष्क को पर्याप्त ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलते हैं। संतुलित आहार, जिसमें हरी सब्जियां, फल, नट्स और ओमेगा-3 फैटी एसिड शामिल हों, दिमागी स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद माना जाता है।

मानसिक सक्रियता और नींद की भूमिका

दिमाग को सक्रिय रखना भी उतना ही जरूरी है। पढ़ना, नई चीजें सीखना, पहेलियां हल करना या किसी रचनात्मक गतिविधि में शामिल होना मानसिक क्षमताओं को मजबूत बनाए रखता है। इसके साथ ही पूरी नींद लेना और तनाव को नियंत्रित करना भी बेहद अहम है। लगातार तनाव और नींद की कमी दिमाग पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकती है।

डिजिटल लाइफस्टाइल में ब्रेक लेना क्यों जरूरी

आज की डिजिटल जीवनशैली में लंबे समय तक बैठकर काम करना और लगातार स्क्रीन के सामने रहना आम हो गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी आदतें मानसिक और शारीरिक दोनों स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकती हैं। दिनभर में छोटे-छोटे ब्रेक लेना, हल्की स्ट्रेचिंग करना और थोड़ी देर टहलना दिमाग को तरोताजा रखने में मदद करता है।

किस उम्र से शुरू होनी चाहिए सावधानी

डिमेंशिया की रोकथाम किसी एक उम्र तक सीमित नहीं है। युवा अवस्था से ही स्वस्थ आदतें अपनाने से बढ़ती उम्र में दिमाग को बेहतर तरीके से सुरक्षित रखा जा सकता है। नियमित रूप से ब्लड प्रेशर, शुगर और कोलेस्ट्रॉल की जांच कराना, धूम्रपान से दूरी बनाना और सामाजिक रूप से जुड़े रहना दिमागी स्वास्थ्य के लिए जरूरी कदम हैं।

लक्षण दिखें तो देर न करें

अगर परिवार के किसी सदस्य में बार-बार चीजें भूलना, व्यवहार में बदलाव, या रोजमर्रा के कामों में परेशानी जैसे लक्षण नजर आएं, तो इन्हें हल्के में नहीं लेना चाहिए। समय रहते न्यूरोलॉजिस्ट से सलाह लेने से सही पहचान हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती स्तर पर पहचान और जीवनशैली में सुधार से डिमेंशिया की रफ्तार को धीमा किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनी रह सकती है।

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