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Early Cancer Detection: 'मैं अभी जवान हूं' वाली ये घातक सोच छोड़िए, उम्र नहीं बल्कि आपकी लापरवाही देखता है सर्वाइकल कैंसर... - News Express, NewsExpress24
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Early Cancer Detection: ‘मैं अभी जवान हूं’ वाली ये घातक सोच छोड़िए, उम्र नहीं बल्कि आपकी लापरवाही देखता है सर्वाइकल कैंसर…

Early Cancer Detection: अक्सर सीके बिरला अस्पताल की मशहूर गायनोकॉलोजिस्ट डॉ. तृप्ति रहेजा के क्लिनिक में महिलाएं एक ही बात दोहराती हैं— “अभी तो मेरी उम्र ही क्या है?” या “मैं अभी जवान हूं, मुझे कैंसर की जांच की क्या जरूरत?” दुर्भाग्यवश, महिलाओं की यही मासूम सी दिखने वाली सोच (Medical Diagnostic Delay) का सबसे बड़ा कारण बनती है। स्वास्थ्य को उम्र की कतार में खड़ा करना एक जानलेवा भूल साबित हो सकती है। सर्वाइकल कैंसर किसी महिला का बर्थ सर्टिफिकेट देखकर हमला नहीं करता, बल्कि यह उन खामोश बदलावों का नतीजा है जो शरीर में जवानी के दिनों से ही जड़ें जमाना शुरू कर देते हैं।

Early Cancer Detection
Early Cancer Detection

खामोशी से शरीर में घर करता है यह वायरस

सर्वाइकल कैंसर कोई रातों-रात होने वाली बीमारी नहीं है। संक्रमण से लेकर कैंसर की अंतिम स्टेज तक पहुंचने में लगभग 10 से 15 साल का लंबा वक्त लगता है। विडंबना यह है कि ज्यादातर महिलाएं अपने (Early Cancer Detection) के संपर्क में 20 से 30 साल की उम्र में आती हैं, क्योंकि इसी दौरान शारीरिक सक्रियता चरम पर होती है। इस उम्र में वायरस शरीर के भीतर ‘साइलेंट प्री-कैंसर’ अवस्था पैदा करता है, जिसमें न दर्द होता है और न ही कोई बाहरी लक्षण दिखाई देते हैं। जब तक आपको तकलीफ महसूस होती है, तब तक इलाज का कीमती अवसर हाथ से निकल चुका होता है।

स्क्रीनिंग बीमारों के लिए नहीं स्वस्थ महिलाओं के लिए है

अक्सर यह गलतफहमी पाली जाती है कि पैप स्मियर (Pap Smear) या एचपीवी टेस्ट केवल बच्चे होने के बाद या 40 की उम्र के बाद ही जरूरी है। हकीकत यह है कि ये टेस्ट संक्रमण का पता लगाने के लिए सबसे कारगर हथियार हैं जो कम उम्र में ही शुरू कर देने चाहिए। राष्ट्रीय गाइडलाइन भी यही कहती हैं कि (Precancerous Stage Identification) के लिए लक्षणों का इंतजार करना खुद को मौत के मुंह में धकेलने जैसा है। स्वस्थ दिखने का मतलब यह कतई नहीं है कि शरीर के अंदर सब कुछ ठीक है, इसलिए नियमित जांच ही सुरक्षा की एकमात्र गारंटी है।

एक पार्टनर और वफादारी के बीच वायरस का खेल

एचपीवी वायरस इतना आम है कि दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत आबादी कभी न कभी इसके संपर्क में आती है। इसे किसी के चरित्र या व्यवहार से जोड़कर देखना न केवल गलत है बल्कि जानलेवा भी है। कई बार महिलाएं सोचती हैं कि “मैं एक वफादार रिश्ते में हूं, तो मुझे खतरा नहीं है,” लेकिन (Virus Transmission Awareness) की कमी यहां भारी पड़ती है। वायरस को आपके रिश्ते की गहराई से कोई मतलब नहीं है; यदि आपके पार्टनर को अनजाने में सालों पहले कभी संक्रमण हुआ था, तो वह आप तक पहुंच सकता है। शर्म को छोड़कर जांच कराना ही बुद्धिमानी है।

डर और शर्म की बेड़ियों को तोड़ना है जरूरी

कई महिलाएं क्लिनिक जाने से सिर्फ इसलिए बचती हैं क्योंकि उन्हें शारीरिक जांच में असहजता महसूस होती है या उन्हें ‘पॉजिटिव’ रिजल्ट आने का डर सताता है। डॉ. रहेजा के अनुसार, ये भावनाएं सामान्य हैं लेकिन (Psychological Barriers in Healthcare) को पार करना ही होगा। याद रखें, जांच बीमारी ढूंढने के लिए नहीं बल्कि भविष्य को सुरक्षित करने के लिए की जाती है। यदि शुरुआती चरण में कुछ असामान्य मिलता भी है, तो उसका इलाज 100 प्रतिशत तक संभव है। असली डर तो जांच न कराकर बीमारी को लाइलाज बनाने में होना चाहिए।

देर से पहचान मतलब महंगा और दर्दनाक इलाज

भारत में सर्वाइकल कैंसर से होने वाली मौतों का सबसे बड़ा कारण यह है कि यहां बीमारी का पता आखिरी स्टेज पर चलता है। अंतिम चरण में इलाज न केवल जटिल और शारीरिक रूप से थकाने वाला होता है, बल्कि (Cancer Treatment Costs) भी मध्यमवर्गीय परिवारों की कमर तोड़ देते हैं। इसके विपरीत, यदि स्क्रीनिंग के जरिए बीमारी का शुरुआती दौर में ही पता चल जाए, तो उपचार साधारण, सस्ता और पूरी तरह प्रभावी होता है। समय पर की गई एक छोटी सी जांच आपको लाखों के खर्च और असहनीय दर्द से बचा सकती है।

स्क्रीनिंग को अपनी जिम्मेदारी समझिए बोझ नहीं

स्क्रीनिंग कराना इस बात का संकेत नहीं है कि आप बीमार हैं, बल्कि यह आपके अपने शरीर और परिवार के प्रति आपकी (Women Health Responsibility) का प्रतीक है। युवा होने का अर्थ यह नहीं है कि आप अभेद्य हैं, बल्कि इसका अर्थ यह है कि आपके पास ‘बचाव’ के लिए सबसे बेहतरीन समय है। इस उम्र में शरीर वैक्सीन और उपचार के प्रति सबसे सटीक प्रतिक्रिया देता है। अपनी सेहत को प्राथमिकता दें और ‘कल करेंगे’ वाली सोच को त्यागकर आज ही विशेषज्ञ से सलाह लें।

समय रहते जांच ही कैंसर के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार

कैंसर के विरुद्ध युद्ध में ‘देरी’ ही दुश्मन का सबसे घातक हथियार साबित होती है। डॉ. तृप्ति रहेजा की सलाह को गंभीरता से लेना हर महिला के लिए अनिवार्य है। (Early Intervention Benefits) को समझते हुए नियमित जांच को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं। आपकी जागरूकता न केवल आपकी जान बचा सकती है, बल्कि आपके परिवार को भी बिखरने से रोक सकती है। याद रखिए, कैंसर से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका उसे पनपने से पहले ही पकड़ लेना है।

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