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BangladeshElection – सत्ता परिवर्तन के बाद लोकतंत्र की बड़ी परीक्षा

BangladeshElection – बांग्लादेश इस समय एक अहम दौर से गुजर रहा है। अगस्त 2024 में छात्र-आंदोलन के बाद सत्ता परिवर्तन हुआ और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद छोड़ना पड़ा। अब 12 फरवरी को होने जा रहे आम चुनावों को देश में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। अंतरिम सरकार, जिसकी अगुवाई नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं, इन चुनावों की निगरानी कर रही है।

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करीब 13 करोड़ पंजीकृत मतदाता देशभर के लगभग 43 हजार मतदान केंद्रों पर अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इतने बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करना प्रशासन के लिए चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है।

सत्ता परिवर्तन की पृष्ठभूमि

पिछले डेढ़ दशक से अवामी लीग के नेतृत्व में सरकार चला रहीं शेख हसीना के खिलाफ जुलाई 2024 में छात्रों ने सरकारी नौकरियों में आरक्षण नीति को लेकर आंदोलन शुरू किया था। यह विरोध धीरे-धीरे व्यापक जनआक्रोश में बदल गया। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, इस दौरान हिंसा और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में सैकड़ों लोगों की जान गई।

स्थिति बिगड़ने पर 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना देश छोड़कर भारत आ गईं। वह फिलहाल दिल्ली में हैं। बांग्लादेश की एक अदालत ने उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शनों से जुड़े मामलों में सजा सुनाई है। ढाका की ओर से प्रत्यर्पण की मांग भी की गई है, जिस पर भारत ने अब तक कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की है।

भारत-बांग्लादेश संबंधों की पृष्ठभूमि

भारत और बांग्लादेश के रिश्ते ऐतिहासिक रूप से गहरे रहे हैं। 1971 में बांग्लादेश की स्वतंत्रता में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही थी। समय के साथ दोनों देशों के संबंधों में सहयोग और तनाव दोनों के दौर आए। अवामी लीग को आम तौर पर भारत के करीब माना जाता रहा है, जबकि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी को लेकर नई दिल्ली में अलग तरह की आशंकाएं व्यक्त की जाती रही हैं।

हाल के घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के रिश्तों में तनाव देखा गया। वीजा सेवाओं पर अस्थायी असर पड़ा और कुछ राजनयिक गतिविधियों में भी कमी आई।

अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर चिंता

सत्ता परिवर्तन के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं। विभिन्न संगठनों ने अगस्त से दिसंबर 2024 के बीच कई घटनाओं का उल्लेख किया है। भारत सरकार ने भी संसद में कहा कि उसे अल्पसंख्यकों से जुड़े मामलों की जानकारी मिली है। इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है।

ढाका प्रशासन का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं।

चुनाव प्रचार में भारत का मुद्दा

चुनावी माहौल में भारत-बांग्लादेश संबंध प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं। सीमा प्रबंधन, नदी जल बंटवारा और व्यापारिक सहयोग जैसे विषयों पर अलग-अलग दलों की अपनी-अपनी राय है। बीएनपी नेतृत्व ने हालिया बयान में कहा है कि वह संतुलित विदेश नीति के पक्ष में है। वहीं जमात-ए-इस्लामी ने भी पड़ोसी देशों के साथ शांतिपूर्ण संबंधों की बात कही है।

नई पीढ़ी की भूमिका

चुनाव में युवाओं की भागीदारी अहम मानी जा रही है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार लगभग 44 प्रतिशत मतदाता 18 से 37 वर्ष की आयु वर्ग में हैं। यही वर्ग राजनीतिक बदलाव की दिशा तय करने में निर्णायक साबित हो सकता है।

बांग्लादेश के सामने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, अर्थव्यवस्था को स्थिर करने और क्षेत्रीय संबंधों को संतुलित रखने की चुनौती है। 12 फरवरी का मतदान न सिर्फ नई सरकार चुनेगा, बल्कि यह तय करेगा कि देश आगे किस राह पर बढ़ेगा।

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