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UKUSRelations – ईरान मुद्दे पर अमेरिका-ब्रिटेन में मतभेद

UKUSRelations – ईरान को लेकर अमेरिका और ब्रिटेन के बीच कूटनीतिक खिंचाव सामने आया है। रिपोर्टों के अनुसार, ब्रिटेन ने अमेरिकी सेना को अपने रॉयल एयर फोर्स ठिकानों का उपयोग ईरान के खिलाफ संभावित हमले के लिए करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह स्थिति तब बनी जब ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने वाले प्रस्तावित समझौते पर सहमति नहीं दी।

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आरएएफ ठिकानों के इस्तेमाल पर असहमति

अमेरिका कथित तौर पर ब्रिटेन के कुछ हवाई अड्डों, विशेषकर ग्लूस्टरशायर स्थित आरएएफ फेयरफोर्ड, का उपयोग लंबी दूरी के बमवर्षक विमानों के लिए करना चाहता था। हालांकि, ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पूर्व-नियोजित सैन्य कार्रवाई में शामिल होना अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में सावधानीपूर्वक परखा जाएगा।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, कानूनी सलाह में यह आशंका जताई गई है कि ऐसे हमले में भागीदारी से ब्रिटेन पर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जवाबदेही तय हो सकती है।

चागोस द्वीप समझौते पर नई तकरार

इस मुद्दे के साथ चागोस द्वीप समूह से जुड़ा समझौता भी चर्चा में आ गया है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत इन द्वीपों की संप्रभुता मॉरीशस को हस्तांतरित की जानी है, जबकि डिएगो गार्सिया स्थित सैन्य अड्डा 99 वर्षों के लिए ब्रिटेन और अमेरिका को लीज पर उपलब्ध रहेगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते पर असहमति जताते हुए सार्वजनिक रूप से कहा है कि ब्रिटेन को अपनी रणनीतिक संपत्तियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि क्षेत्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अधिक सख्त रुख अपनाने की आवश्यकता है।

कानूनी सलाह और अंतरराष्ट्रीय दायित्व

ब्रिटेन के अटॉर्नी जनरल ने कथित तौर पर सरकार को आगाह किया है कि केवल आत्मरक्षा या ब्रिटिश संपत्तियों की सुरक्षा के संदर्भ में ही सैन्य सहयोग को उचित ठहराया जा सकता है। इसके अतिरिक्त किसी भी हमले में सीधी भागीदारी अंतरराष्ट्रीय कानून की कसौटी पर चुनौतीपूर्ण हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र से जुड़े प्रावधानों का हवाला देते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई देश सैन्य कार्रवाई के लिए अपने ठिकानों की अनुमति देता है, तो उसे भी उस कार्रवाई के परिणामों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज

रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ने हाल के वर्षों में इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई है। संभावित तनाव को देखते हुए ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने भी क्षेत्र में अतिरिक्त टाइफून और एफ-35 लड़ाकू विमानों की तैनाती की है, ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का सामना किया जा सके।

दिलचस्प पहलू यह है कि डिएगो गार्सिया अड्डे के उपयोग को लेकर अमेरिका को केवल सूचना देने की आवश्यकता है, जबकि ब्रिटेन की मुख्य भूमि पर स्थित आरएएफ ठिकानों के लिए औपचारिक अनुमति जरूरी है। फिलहाल सरकार ने ऐसी किसी अनुमति को रोक रखा है।

कूटनीतिक संतुलन की चुनौती

विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल सैन्य रणनीति का नहीं, बल्कि कूटनीतिक संतुलन का भी है। एक ओर अमेरिका अपने सुरक्षा दृष्टिकोण को प्राथमिकता दे रहा है, तो दूसरी ओर ब्रिटेन अंतरराष्ट्रीय कानून और दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर किस तरह की सहमति बनती है। फिलहाल स्थिति ने ट्रांसअटलांटिक संबंधों में एक नई जटिलता जोड़ दी है।

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