झारखण्ड

HighCourt – बाबूलाल मरांडी को पांच प्राथमिकी से मिली राहत

HighCourt – झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता बाबूलाल मरांडी को झारखंड हाईकोर्ट से अहम राहत मिली है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मामले में उनके खिलाफ दर्ज पांचों प्राथमिकी को अदालत ने निरस्त करने का आदेश दिया है। यह फैसला मंगलवार को जस्टिस एके चौधरी की अदालत में हुई सुनवाई के बाद सुनाया गया। मरांडी ने इन मामलों को रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी, जिस पर विस्तृत बहस के बाद अदालत ने अपना निर्णय सुरक्षित रखा था और अब आदेश जारी किया।

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मामले की पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला उस बयान से जुड़ा है, जो बाबूलाल मरांडी ने एक यूट्यूब चैनल को दिए साक्षात्कार में दिया था। उस इंटरव्यू में उन्होंने राज्य सरकार की नीतियों और कार्यप्रणाली की आलोचना की थी। साथ ही मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके परिवार का उल्लेख भी किया गया था। इसके बाद राज्य के अलग-अलग थानों में उनके खिलाफ पांच प्राथमिकी दर्ज की गईं। शिकायतकर्ताओं का आरोप था कि बयान आपत्तिजनक और मानहानिकारक है।

बचाव पक्ष की दलील

सुनवाई के दौरान मरांडी की ओर से वरीय अधिवक्ता अजीत कुमार समेत अन्य वकीलों ने अदालत के समक्ष विस्तार से पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल का बयान राजनीतिक आलोचना की श्रेणी में आता है और इसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। बचाव पक्ष ने कहा कि दर्ज प्राथमिकी में लगाए गए आरोप न तो मानहानि की कसौटी पर खरे उतरते हैं और न ही वे सामाजिक वैमनस्य फैलाने वाले हैं। अधिवक्ताओं ने यह भी दलील दी कि बयान को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत किया गया और राजनीतिक कारणों से अलग-अलग स्थानों पर मामले दर्ज कराए गए।

अदालत की टिप्पणी और फैसला

सभी पक्षों की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि एक ही कथित बयान के आधार पर विभिन्न थानों में अलग-अलग प्राथमिकी दर्ज करना उचित नहीं है। अदालत ने मामले के तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए सभी पांचों प्राथमिकी को रद्द करने का आदेश दिया। न्यायालय के इस फैसले के बाद मरांडी को बड़ी कानूनी राहत मिली है। हालांकि अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि राजनीतिक बयानबाजी में संयम बनाए रखना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है।

राजनीतिक प्रतिक्रिया की संभावना

हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य की राजनीतिक हलचल तेज होने की संभावना है। हालांकि इस मामले में अभी तक सरकार या विपक्ष की ओर से औपचारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन निर्णय को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जानकारों का मानना है कि यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक आलोचना की सीमाओं को लेकर भी एक महत्वपूर्ण संकेत देता है।

कानूनी दृष्टिकोण से अहम मामला

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, एक ही घटना या बयान पर कई जगह प्राथमिकी दर्ज होने के मामलों में अदालतें पहले भी हस्तक्षेप करती रही हैं। इस प्रकरण में भी हाईकोर्ट ने यही सिद्धांत लागू किया। अदालत का आदेश आने के बाद अब संबंधित थानों में दर्ज सभी मामलों की प्रक्रिया स्वतः समाप्त मानी जाएगी।

फिलहाल, इस फैसले से बाबूलाल मरांडी को तत्काल राहत मिल गई है और आगे किसी प्रकार की आपराधिक कार्रवाई का खतरा टल गया है। मामले ने राजनीतिक बयान और कानूनी दायरे के बीच संतुलन पर एक बार फिर चर्चा को जन्म दिया है।

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