Jharkhand Biyar Caste Survey 2026: झारखंड में बियार जाति का होगा महासर्वे, बदलेगी 50 हजार लोगों की किस्मत
Jharkhand Biyar Caste Survey 2026: झारखंड की धरती पर अपनी पहचान और वजूद की लड़ाई लड़ रहे बियार समुदाय के लिए एक बड़ी और उम्मीद भरी खबर सामने आई है। राज्य सरकार ने इस जाति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का दोबारा मूल्यांकन करने के लिए एक व्यापक सर्वेक्षण कराने का निर्णय लिया है। पिछले कई दशकों से यह समुदाय खुद को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की श्रेणी में शामिल करने की पुरजोर मांग कर रहा है। इस (Tribal Status Demands) को ध्यान में रखते हुए प्रशासन ने अब वैज्ञानिक और सांख्यिकीय आधार पर शोध करने की तैयारी पूरी कर ली है ताकि उनके दावों की सत्यता की जांच की जा सके।

डॉ रामदयाल मुंडा संस्थान संभालेगा सर्वे की कमान
इस महत्वपूर्ण शोध कार्य की जिम्मेदारी झारखंड के प्रतिष्ठित डॉ रामदयाल मुंडा जनजातीय कल्याण शोध संस्थान (टीआरआई) को सौंपी गई है। संस्थान ने एक विशेषज्ञ एजेंसी के चयन के लिए निविदा जारी कर दी है, जिसे अगले छह माह के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपनी होगी। इस (Ethnographic Research Study) के माध्यम से बियार जाति के हर उस पहलू को खंगाला जाएगा जो उन्हें जनजातीय समाज के करीब लाता है। सरकार का लक्ष्य है कि इस सर्वे के जरिए प्राप्त आंकड़े पूरी तरह पारदर्शी और सटीक हों ताकि केंद्र सरकार के समक्ष मजबूती से पक्ष रखा जा सके।
ओबीसी से एसटी तक का संघर्षपूर्ण सफर
वर्तमान में झारखंड में बियार समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सूची में रखा गया है। हालांकि, समुदाय के प्रतिनिधियों का तर्क है कि उनके रीति-रिवाज, परंपराएं और भौगोलिक अलगाव उन्हें पड़ोसी राज्यों की अनुसूचित जनजातियों के समकक्ष खड़ा करते हैं। इस (Social Categorization Conflict) के कारण उन्हें वे लाभ नहीं मिल पा रहे हैं जो एक जनजातीय समाज को मिलने चाहिए। लगभग 50 हजार की आबादी वाला यह वर्ग खुद को व्यवस्था की खामियों के कारण पिछड़ा हुआ मानता है और अब बदलाव की आस लगाए बैठा है।
आजीविका का संकट और पलायन का दंश
बियार समुदाय के लोग मुख्य रूप से सब्जियों और फलों के व्यापार से जुड़े हुए हैं, लेकिन इनके पास अपनी जमीन न के बराबर है। खुद को भूमिहीन बताने वाला यह समाज स्थिर आय के अभाव में अक्सर (Rural Population Migration) का शिकार होता है। सम्मानजनक जीवन और बुनियादी सुविधाओं की तलाश में इन्हें अक्सर झारखंड छोड़कर दूसरे राज्यों का रुख करना पड़ता है। यह सर्वे यह भी पता लगाएगा कि आखिर क्यों विकास की किरणें इस समुदाय के झोपड़ों तक नहीं पहुंच सकीं और उनकी आर्थिक स्थिति इतनी जर्जर क्यों है।
नस्लीय संरचना और आदिम विशेषताओं का दस्तावेजीकरण
सर्वेक्षण के दौरान एजेंसी केवल जनसंख्या ही नहीं गिनेगी, बल्कि समुदाय की उत्पत्ति और उनकी नस्लीय संरचना का भी गहरा अध्ययन करेगी। उनके पूर्वजों का इतिहास, नामाकरण की प्रक्रिया और उनके शरीर की बनावट से जुड़े (Primitive Trait Indicators) का बारीकी से दस्तावेजीकरण किया जाएगा। यह शोध का एक बहुत ही संवेदनशील हिस्सा है क्योंकि इसके आधार पर ही यह तय होगा कि क्या बियार जाति वास्तव में किसी आदिम जनजाति का हिस्सा रही है या समय के साथ उनकी विशेषताएं बदल गई हैं।
धार्मिक रीति-रिवाजों और संस्कृति का होगा बारीकी से अध्ययन
बियार जाति का दावा है कि उनकी संस्कृति और त्योहार झारखंड की अन्य जनजातियों जैसे ही हैं। शोध दल उनकी धार्मिक मान्यताओं, कुल देवताओं और पारंपरिक उत्सवों का गहराई से विश्लेषण करेगा। इस (Cultural Heritage Documentation) के जरिए यह देखा जाएगा कि उनकी जीवनशैली में आधुनिकता का कितना प्रवेश हुआ है और वे आज भी अपनी जड़ों से कितने जुड़े हुए हैं। उनकी बोलियों और प्रचलित लोक कथाओं का भाषाई वर्गीकरण भी इस रिपोर्ट का एक अहम हिस्सा होने वाला है।
सामाजिक संरचना और मुख्यधारा से उनकी दूरी
यह अध्ययन समाज के अंदर उनकी धारणाओं और मुख्यधारा के समाज के साथ उनके संबंधों की भी पड़ताल करेगा। गांव के स्तर पर उनकी सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी कितनी है और क्या उन्हें आज भी समाज के अन्य वर्गों के साथ घुलने-मिलने में झिझक होती है, इस पर भी डेटा जुटाया जाएगा। यह (Social Inclusion Assessment) रिपोर्ट यह स्पष्ट करेगी कि बियार समुदाय सामाजिक रूप से कितना कटा हुआ है। उनके प्रमुख आवासीय क्षेत्रों और जनसंख्या घनत्व का नक्शा भी तैयार किया जाएगा ताकि उनके भौगोलिक अलगाव को समझा जा सके।
केंद्र सरकार के पांच कड़े मापदंडों पर होगी अग्निपरीक्षा
किसी भी जाति को एसटी सूची में शामिल करने के लिए भारत सरकार ने पांच कड़े मापदंड निर्धारित किए हैं। इस सर्वे रिपोर्ट को इन्हीं पैमानों पर तैयार किया जाएगा, जिसमें विशिष्ट संस्कृति, भौगोलिक अलगाव, बाहरी समुदाय से संपर्क में संकोच, आदिम लक्षण और (Socio Economic Backwardness) शामिल हैं। यदि बियार समुदाय इन पांचों मानकों पर खरा उतरता है, तो उनके लिए आरक्षण और अन्य विशेष योजनाओं के द्वार खुल जाएंगे। यह रिपोर्ट उनकी भविष्य की दिशा और दशा तय करने में सबसे बड़ा दस्तावेज साबित होगी।
बिहार से सटे जिलों में सिमटा है यह बड़ा वर्ग
झारखंड में बियार समुदाय मुख्य रूप से उन जिलों में बसा हुआ है जिनकी सीमाएं बिहार से लगती हैं। भौगोलिक रूप से वे एक विशिष्ट क्षेत्र में केंद्रित हैं, जो उनके (Geographical Isolation Patterns) को समझने में वैज्ञानिकों की मदद करेगा। शोध एजेंसियां इन इलाकों के हर घर तक पहुंचेंगी ताकि कोई भी परिवार इस गणना से छूट न जाए। स्थानीय स्तर पर समुदाय के बुजुर्गों से बातचीत की जाएगी ताकि उनके मौखिक इतिहास को लिखित रूप में संकलित किया जा सके, जो अक्सर सरकारी फाइलों में दर्ज नहीं हो पाता।
एक न्यायसंगत भविष्य की ओर बढ़ते कदम
टीआरआई द्वारा शुरू की गई यह निविदा प्रक्रिया केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह हजारों लोगों के संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई है। सरकार चाहती है कि (Tribal Community Welfare) के उद्देश्य से किया जा रहा यह अध्ययन इतना पुख्ता हो कि इसे कानूनी रूप से चुनौती न दी जा सके। छह महीने बाद जब यह रिपोर्ट सामने आएगी, तब यह स्पष्ट होगा कि बियार जाति को झारखंड की अनुसूचित जनजाति सूची में जगह मिलेगी या नहीं। फिलहाल, समुदाय के लोगों में इस कदम से खुशी की लहर है और वे अपनी पहचान को मान्यता मिलने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।


