Jharkhand Naxalism Decline Report: नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार! झारखंड की बड़ी जीत, 2026 तक होगा पूरी तरह सफाया
Jharkhand Naxalism Decline Report: झारखंड के सुरक्षा इतिहास में साल 2025 एक निर्णायक अध्याय के रूप में दर्ज हो रहा है। कभी नक्सल प्रभाव से जूझ रहे राज्य के हालात अब पूरी तरह बदलते नजर आ रहे हैं। पांच साल पहले तक जहां 19 जिले नक्सल प्रभावित माने जाते थे, वहीं अब सिर्फ पश्चिमी सिंहभूम का चाईबासा जिला ही गंभीर प्रभाव की श्रेणी में बचा है। यह बदलाव राज्य में चलाए गए लगातार अभियानों और ठोस रणनीति का नतीजा है, जिसे (anti-naxal operations) की बड़ी सफलता माना जा रहा है।

स्पलिंटर ग्रुप्स की कमर भी टूटी
भाकपा माओवादी ही नहीं, बल्कि पीएलएफआई, जेजेएमपी और टीपीसी जैसे स्पलिंटर ग्रुप्स भी अब लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं। एक समय ये संगठन अलग-अलग इलाकों में डर और हिंसा का पर्याय थे, लेकिन अब इनकी गतिविधियां नाममात्र की रह गई हैं। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक इन समूहों का नेटवर्क टूट चुका है और जमीनी पकड़ खत्म हो गई है, जो (splinter groups collapse) की ओर इशारा करता है।
झुमरा और लुगू से खत्म हुआ आखिरी दस्ता
बोकारो के झुमरा और लुगू पहाड़ी इलाके कभी माओवादियों के मजबूत गढ़ माने जाते थे। लेकिन 2025 में यहां माओवादियों का आखिरी सक्रिय दस्ता भी खत्म कर दिया गया। रणविजय महतो की गिरफ्तारी और उसके सहयोगियों के मारे जाने के बाद यह इलाका पूरी तरह नक्सल मुक्त हो गया। यह उपलब्धि (core area clearance) के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है।
शीर्ष माओवादी नेताओं के खात्मे से टूटा नेटवर्क
एक करोड़ के इनामी विवेक उर्फ प्रयाग मांझी, सहदेव सोरेन जैसे केंद्रीय कमेटी नेताओं के मारे जाने के बाद उत्तरी छोटानागपुर में माओवादी संगठन पूरी तरह खत्म हो गया। इन नेताओं की मौजूदगी ही संगठन की रीढ़ मानी जाती थी। इनके खात्मे से न केवल रणनीतिक नेतृत्व टूटा, बल्कि कैडर का मनोबल भी गिरा, जो (leadership neutralization) की बड़ी कामयाबी है।
सारंडा में सिमट गया अंतिम प्रभाव क्षेत्र
लगातार दबाव के चलते माओवादियों को कई बार सारंडा जंगल क्षेत्र में अपनी लोकेशन बदलनी पड़ी। अब स्थिति यह है कि सारंडा के एक सीमित हिस्से में ही माओवादियों का छोटा सा दस्ता सक्रिय है। यहां एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा, पतिराम मांझी उर्फ अनल और असीम मंडल के साथ 40 से भी कम सशस्त्र माओवादी बचे हैं। यह स्पष्ट रूप से (shrinking influence zone) को दर्शाता है।
एसआरआई जिलों की संख्या में भारी गिरावट
मार्च 2025 में झारखंड के नौ जिले सेक्यूरिटी रिलेटेड एक्सपेंडेचर जिलों की सूची में थे, लेकिन अक्टूबर तक यह संख्या घटकर सिर्फ चार रह गई। यह आंकड़ा नक्सलवाद के भौगोलिक संकुचन को साफ दिखाता है। एक समय जामताड़ा और साहिबगंज को छोड़कर लगभग पूरा राज्य प्रभावित था, जो अब इतिहास बन चुका है। यह परिवर्तन (security footprint reduction) की मजबूत मिसाल है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की 2026 डेडलाइन
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देशभर से माओवाद खत्म करने की डेडलाइन 31 मार्च 2026 तय की है। झारखंड में भी इसी लक्ष्य के तहत अभियान तेज किए गए हैं। राज्य में फिलहाल केंद्रीय बलों की नौ बटालियन तैनात हैं, जो स्थानीय पुलिस के साथ मिलकर ऑपरेशन चला रही हैं। यह समन्वय (central forces deployment) को और प्रभावी बनाता है।
गिरफ्तारियों और आत्मसमर्पण का मजबूत आंकड़ा
2016 से सितंबर 2025 तक झारखंड में कुल 4,147 नक्सलियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। सबसे ज्यादा गिरफ्तारियां 2017 में दर्ज की गईं, जब 561 नक्सली पकड़े गए। इसी अवधि में 242 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण भी किया है। ये आंकड़े बताते हैं कि सुरक्षा बलों की रणनीति केवल मुठभेड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि (surrender policy impact) भी कारगर साबित हुई है।
अब भी बाकी हैं कुछ अधूरे लक्ष्य
हालांकि तस्वीर काफी हद तक बदल चुकी है, लेकिन चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। पश्चिमी सिंहभूम के सारंडा क्षेत्र को पूरी तरह नक्सल मुक्त करना अभी बाकी है। एक पोलित ब्यूरो सदस्य और दो एक करोड़ के इनामी माओवादी अब भी सक्रिय बताए जा रहे हैं। यह स्थिति (remaining threats) की ओर संकेत करती है।
टीपीसी और अन्य संगठनों से जुड़ी चुनौतियां
टीपीसी प्रमुख ब्रजेश गंझू शशिकांत और उसके सहयोगियों के साथ हुई मुठभेड़ों में पुलिस को भी नुकसान उठाना पड़ा है। इसके अलावा रवींद्र गंझू और हजारीबाग के सैक कमांडर सहदेव जैसे नाम अब भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हुए हैं। इनकी गिरफ्तारी (high value target hunt) का अगला बड़ा लक्ष्य है।
सुरक्षा से विकास की ओर बढ़ता झारखंड
नक्सल प्रभाव के सिमटने से झारखंड में विकास की रफ्तार तेज होने की उम्मीद जगी है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से जुड़े प्रोजेक्ट्स अब उन इलाकों तक पहुंच रहे हैं, जहां पहले प्रशासन की मौजूदगी भी मुश्किल थी। यह बदलाव (development after insurgency) की दिशा में बड़ा संकेत है।
अंतिम चरण की ओर बढ़ता अभियान
साफ है कि झारखंड में नक्सलवाद अब अपने अंतिम दौर में है। सुरक्षा बलों का दबाव, नेतृत्व का खात्मा और जनसमर्थन में कमी ने माओवादी संगठनों को हाशिए पर ला दिया है। यदि मौजूदा गति बनी रही, तो 31 मार्च 2026 की डेडलाइन से पहले ही राज्य पूरी तरह नक्सल मुक्त हो सकता है। यह यात्रा (end of red terror) की ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में दर्ज होगी।



