LegalAction – पुल गिरने के मामलों पर सरकार को हाईकोर्ट की सख्त चेतावनी
LegalAction – झारखंड में पिछले वर्षों के दौरान पुल गिरने की घटनाओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर मंगलवार देर रात हुई सुनवाई में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने पाया कि पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद सरकार की ओर से अब तक जवाब दाखिल नहीं किया गया है। अदालत ने इसे गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट संकेत दिया कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी स्वीकार्य नहीं है।

ग्रामीण विकास विभाग को सीधी चेतावनी
सुनवाई के दौरान अदालत ने ग्रामीण विकास विभाग के सचिव को कड़ा संदेश दिया। न्यायालय ने कहा कि यदि अगली निर्धारित तिथि तक जवाब दाखिल नहीं किया गया, तो संबंधित अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से 10 हजार रुपये का जुर्माना अदा करना होगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राशि सरकारी खजाने से नहीं बल्कि अधिकारी को स्वयं अपनी जेब से देनी होगी और यह धनराशि याचिकाकर्ता को दी जाएगी। अदालत की इस टिप्पणी से यह स्पष्ट हो गया कि न्यायालय मामले को लेकर गंभीर है।
जनहित याचिका में क्या उठाया गया है मुद्दा
यह याचिका पंकज कुमार यादव द्वारा दाखिल की गई है। इसमें पिछले दस वर्षों के दौरान राज्य में पुलों के गिरने की घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसी घटनाओं से सार्वजनिक धन की हानि के साथ-साथ लोगों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ती है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि 27 नवंबर 2025 और 9 जनवरी 2026 को भी सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन अब तक कोई संतोषजनक प्रतिक्रिया प्रस्तुत नहीं की गई।
पूर्व निर्देशों की अनदेखी पर कोर्ट की नाराजगी
खंडपीठ ने इस बात पर विशेष असंतोष जताया कि न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद समयसीमा का पालन नहीं किया गया। अदालत ने कहा कि यदि सरकारी विभाग समय पर जवाब नहीं देंगे तो न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होगी। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि बार-बार अवसर देने के बावजूद यदि जवाब नहीं आता है तो इसे गंभीर लापरवाही माना जाएगा। न्यायालय का रुख इस मामले में जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में देखा जा रहा है।
अंतिम अवसर के साथ नई समयसीमा तय
मामले की सुनवाई के अंत में अदालत ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए 24 फरवरी तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। साथ ही याचिकाकर्ता को प्रति-उत्तर दाखिल करने के लिए 11 मार्च तक का समय दिया गया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 18 मार्च को निर्धारित की है। न्यायालय ने संकेत दिया कि अगली तारीख पर यदि जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया तो कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता पर उठते सवाल
राज्य में पुलों के गिरने की घटनाओं ने बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं। सार्वजनिक परियोजनाओं में पारदर्शिता, तकनीकी जांच और समय-समय पर निरीक्षण की आवश्यकता पर भी चर्चा हो रही है। इस मामले की सुनवाई को राज्य में निर्माण कार्यों की जवाबदेही से जोड़कर देखा जा रहा है। अदालत की सक्रियता से यह उम्मीद जताई जा रही है कि भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे।
आगे की कार्यवाही पर निगाहें
अब सबकी नजर 18 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार निर्धारित समयसीमा के भीतर जवाब दाखिल करती है या नहीं। यदि अदालत के निर्देशों का पालन नहीं होता है तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ व्यक्तिगत दंड की संभावना बनी हुई है। इस मामले ने प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दे को फिर से केंद्र में ला दिया है।



