IranUSConflict – श्रीलंका के पास तनाव के बीच भारत ने ईरानी युद्धपोत को दी शरण
IranUSConflict – मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब हिंद महासागर क्षेत्र तक महसूस किया जाने लगा है। हाल ही में श्रीलंका के तट के पास एक अमेरिकी पनडुब्बी द्वारा ईरान के युद्धपोत को निशाना बनाए जाने की घटना के बाद क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी घटनाक्रम के बीच भारत ने ईरान के एक अन्य युद्धपोत ‘आईरिस लावन’ को केरल के कोच्चि बंदरगाह पर ठहरने की अनुमति दी है। कूटनीतिक हलकों में इसे भारत द्वारा क्षेत्रीय परिस्थितियों के बीच संतुलित और सावधानीपूर्ण रुख अपनाने के रूप में देखा जा रहा है।

श्रीलंका के पास हुई सैन्य कार्रवाई से बढ़ी चिंता
तनाव उस समय बढ़ गया जब श्रीलंका के तट से करीब 19 समुद्री मील दूर समुद्र में एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के फ्रिगेट ‘आईरिस डेना’ पर हमला किया। बताया गया कि टॉरपीडो से किए गए इस हमले में जहाज गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया और अंततः समुद्र में डूब गया। इस घटना में 80 से अधिक ईरानी नाविकों के मारे जाने की खबर सामने आई।
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे टकराव का असर पहली बार भारत के समुद्री पड़ोस तक पहुंचने का संकेत देती है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने कई देशों के लिए सुरक्षा और समुद्री यातायात को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
तकनीकी खराबी के बाद भारत से मांगी गई मदद
इस बीच ईरान के युद्धपोत ‘आईरिस लावन’ को लेकर भारत के सामने एक अलग स्थिति पैदा हुई। यह जहाज पिछले महीने भारत में आयोजित इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू में हिस्सा लेने आया था। अधिकारियों के अनुसार जहाज में तकनीकी समस्या आने के बाद ईरान ने भारत से संपर्क कर उसे मरम्मत और सुरक्षित ठहराव के लिए कोच्चि बंदरगाह पर रुकने की अनुमति मांगी।
सूत्रों के मुताबिक ईरान की ओर से 28 फरवरी को यह अनुरोध किया गया था। आवश्यक औपचारिकताओं के बाद भारत ने 1 मार्च को इसकी अनुमति दे दी। इसके बाद बुधवार को यह युद्धपोत कोच्चि पहुंच गया। जहाज पर मौजूद लगभग 183 चालक दल के सदस्य फिलहाल भारतीय नौसेना की देखरेख में हैं और उन्हें अस्थायी रूप से ठहराया गया है।
श्रीलंका ने भी दिया मानवीय आधार पर सहयोग
भारत के साथ-साथ श्रीलंका ने भी एक अन्य ईरानी युद्धपोत को सहायता प्रदान की है। जानकारी के अनुसार ‘आईरिस बुशहर’ नामक जहाज में तकनीकी समस्या आने के बाद उसे श्रीलंका में रुकने की अनुमति दी गई। जहाज पर मौजूद 200 से अधिक क्रू मेंबरों को अस्थायी रूप से एक नौसैनिक शिविर में रखा गया है।
श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायक ने इस फैसले को मानवीय जिम्मेदारी बताते हुए कहा कि समुद्री नियमों और अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत संकट में फंसे जहाजों को सहायता देना देशों का कर्तव्य है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की परिस्थितियों में मानवीय दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होता है।
भारत के लिए कूटनीतिक संतुलन की चुनौती
वर्तमान हालात भारत के लिए कूटनीतिक दृष्टि से काफी संवेदनशील माने जा रहे हैं। एक ओर ईरान के साथ भारत के लंबे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर अमेरिका भारत का प्रमुख रणनीतिक साझेदार माना जाता है। ऐसे में क्षेत्रीय तनाव के बीच भारत को अपने कदम बहुत सावधानी से उठाने पड़ रहे हैं।
देश के भीतर कुछ राजनीतिक दलों और पूर्व राजनयिकों ने यह सवाल भी उठाया है कि भारत के समुद्री क्षेत्र के आसपास हुई इस घटना पर सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत सीमित क्यों रही। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में भारत आम तौर पर संतुलित और संयमित कूटनीतिक रुख अपनाता है।
तेल आपूर्ति को लेकर भी बढ़ी चिंता
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। ईरान की ओर से हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की संभावित चेतावनियों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में चिंता पैदा कर दी है। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है।
भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा इसी मार्ग के जरिए आयात करता है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री मार्ग प्रभावित होता है तो इसका असर भारत की ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक तेल बाजार दोनों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में इस क्षेत्र की स्थिति पर भारत समेत कई देशों की नजर बनी रहेगी



