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LNGSupply – मध्य पूर्व तनाव से भारत की गैस आपूर्ति प्रभावित, सक्रिय हुई सरकार

LNGSupply – मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है और इसका असर भारत तक साफ दिखाई देने लगा है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी टकराव के चलते ऊर्जा आपूर्ति के अहम मार्गों पर दबाव बढ़ गया है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास हालात बिगड़ने से तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन प्रभावित हुई है। इस स्थिति का सीधा असर भारत पर पड़ा है, जहां तरलीकृत प्राकृतिक गैस की लगभग 40 प्रतिशत आपूर्ति अचानक बाधित हो गई है। आयात पर निर्भर ऊर्जा व्यवस्था के कारण यह संकट केवल ऊर्जा क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि उद्योग, परिवहन और महंगाई पर भी इसका असर पड़ सकता है। इसी बीच पेट्रोलियम मंत्रालय ने उपलब्ध गैस के बेहतर उपयोग के लिए एक नई वितरण रणनीति तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

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मध्य पूर्व में तनाव से बिगड़ी ऊर्जा आपूर्ति

ताजा संकट की जड़ मध्य पूर्व की भू-राजनीतिक स्थिति में है। मार्च 2026 के आसपास हालात तब और गंभीर हो गए जब क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हुईं और ईरान ने प्रतिक्रिया स्वरूप स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के मार्ग को प्रभावी रूप से सीमित कर दिया। यह वही समुद्री रास्ता है जिससे दुनिया की लगभग पांचवां हिस्सा तेल आपूर्ति गुजरती है।

इसी दौरान कतर ने सुरक्षा कारणों से अपने एलएनजी उत्पादन को अस्थायी रूप से रोक दिया, जिससे वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई। भारत जैसे देश, जो ऊर्जा आयात पर काफी निर्भर हैं, इस स्थिति से सीधे प्रभावित हुए। आंकड़ों के अनुसार भारत का लगभग 52 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात इसी समुद्री मार्ग से आता है। तनाव बढ़ने के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत करीब 83 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई, जो कुछ सप्ताह पहले लगभग 72 डॉलर थी।

घरेलू बाजार पर पड़ने लगा असर

अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का असर घरेलू ऊर्जा बाजार में भी दिखने लगा है। हाल के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में 14.2 किलोग्राम के एलपीजी सिलेंडर की कीमत बढ़कर लगभग 913 रुपये तक पहुंच गई है। इसी तरह कमर्शियल एलपीजी सिलेंडर की कीमत करीब 1,883 रुपये बताई जा रही है।

भारत की ऊर्जा जरूरतों में आयात की हिस्सेदारी लगातार बढ़ रही है। वित्त वर्ष 2025-26 के शुरुआती दस महीनों में देश की आयात निर्भरता लगभग 88.6 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष के मुकाबले थोड़ी अधिक है। घरेलू उत्पादन लगभग स्थिर रहने के बावजूद ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। ऐसे में एलएनजी आपूर्ति में संभावित कटौती चिंता का विषय बन गई है। कुछ रिपोर्टों में यह भी संकेत दिया गया है कि कतर से आने वाली गैस सप्लाई बाधित होने के कारण आयात में बड़ी कमी आ सकती है।

उद्योगों और उपभोक्ताओं के लिए क्यों अहम है यह संकट

एलएनजी केवल औद्योगिक ईंधन नहीं है बल्कि शहरी गैस वितरण प्रणाली की भी अहम कड़ी है। शहरों में पाइप से मिलने वाली घरेलू गैस, सीएनजी आधारित परिवहन, बिजली उत्पादन और उर्वरक उद्योग—सभी किसी न किसी रूप में गैस आपूर्ति पर निर्भर हैं।

यदि आपूर्ति कम होती है तो बाजार में गैस की कीमतें बढ़ सकती हैं। इसका असर परिवहन लागत, माल ढुलाई और कई उपभोक्ता वस्तुओं के दाम पर भी पड़ सकता है। इसलिए ऊर्जा क्षेत्र में पैदा हुआ यह संकट धीरे-धीरे व्यापक आर्थिक प्रभाव डाल सकता है।

गैस वितरण में प्राथमिकता तय करने की तैयारी

मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार गैस के उपयोग को प्राथमिकता के आधार पर व्यवस्थित करने की योजना बना रही है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आवश्यक क्षेत्रों में आपूर्ति बनी रहे।

इस प्रक्रिया में कुछ उद्योगों को गैस की कम उपलब्धता का सामना करना पड़ सकता है। आम तौर पर सिरेमिक, कांच निर्माण, स्पंज आयरन और कुछ पेट्रोकेमिकल इकाइयों को गैर-प्राथमिकता वाले क्षेत्र माना जाता है। यदि सप्लाई घटती है तो इन उद्योगों को वैकल्पिक ईंधन जैसे कोयला, नेफ्था या फर्नेस ऑयल का सहारा लेना पड़ सकता है।

उर्वरक क्षेत्र पर संभावित असर

उर्वरक उद्योग को आम तौर पर ऊर्जा वितरण में प्राथमिकता दी जाती है क्योंकि यह सीधे कृषि उत्पादन से जुड़ा है। यूरिया उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली एलएनजी का बड़ा हिस्सा कतर से आता है। हालांकि सरकार इस क्षेत्र को प्राथमिकता देने की बात कहती है, लेकिन ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि संकट लंबा चलता है तो सप्लाई में सीमित कटौती की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।

किसानों के लिए फिलहाल राहत की स्थिति

कृषि क्षेत्र के लिए फिलहाल स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है। खरीफ सीजन की बुवाई जून में शुरू होती है और वर्तमान समय में उर्वरक की मांग अपेक्षाकृत कम है। इसी दौरान कई उर्वरक संयंत्र नियमित रखरखाव के दौर से गुजरते हैं।

उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार देश में उर्वरकों का सुरक्षित भंडार मौजूद है। यूरिया सहित अन्य प्रमुख उर्वरकों का स्टॉक पिछले वर्ष की तुलना में काफी अधिक बताया जा रहा है। इसी तरह डीएपी और एनपीके जैसे फॉस्फेटिक उर्वरकों की उपलब्धता भी पर्याप्त बताई जा रही है, क्योंकि भारत ने पिछले कुछ वर्षों में इनके आयात स्रोतों को विविध बनाया है।

वैकल्पिक आपूर्ति के लिए नए विकल्प तलाशे जा रहे

ऊर्जा आपूर्ति में आई इस कमी को पूरा करने के लिए भारत दूसरे देशों से अतिरिक्त एलएनजी खरीदने के विकल्प तलाश रहा है। पश्चिम एशिया के बाहर पहले से ही भारत बड़ी मात्रा में गैस आयात करता है और अब ऑस्ट्रेलिया तथा कनाडा जैसे देशों के साथ संभावित आपूर्ति पर बातचीत तेज की गई है।

हालांकि इस प्रक्रिया में कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी सामने हैं। अचानक नई जगहों से गैस आयात करने के लिए विशेष एलएनजी टैंकरों की उपलब्धता जरूरी होती है, जिन्हें तुरंत जुटाना आसान नहीं होता। इसके अलावा जिन देशों से गैस खरीदी जानी है, वहां गैस को तरल रूप में बदलने की अतिरिक्त क्षमता भी उपलब्ध होनी चाहिए।

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