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DashaMataVrat – 13 मार्च को मनाया जाएगा दशा माता व्रत, जानें तिथि और पूजा विधि

DashaMataVrat – हिंदू परंपरा में कई ऐसे व्रत और पर्व होते हैं जिन्हें परिवार की सुख-समृद्धि और मंगल कामनाओं से जोड़कर देखा जाता है। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण व्रत है दशा माता व्रत। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने परिवार की खुशहाली और स्थिरता के लिए रखती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन दशा माता की पूजा करने से जीवन की कठिन परिस्थितियां दूर होती हैं और घर-परिवार में सकारात्मक परिवर्तन आता है। इस वर्ष यह व्रत 13 मार्च को रखा जाएगा, जो चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को पड़ता है। कई स्थानों पर यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और महिलाएं श्रद्धा के साथ इस दिन व्रत और पूजा करती हैं।

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दशमी तिथि का समय और धार्मिक महत्व

पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण दशमी तिथि 13 मार्च की सुबह 6 बजकर 28 मिनट से प्रारंभ होगी और अगले दिन 14 मार्च की सुबह 8 बजकर 10 मिनट तक रहेगी। इसी तिथि में दशा माता व्रत रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन की पूजा गृहस्थ जीवन में संतुलन और समृद्धि लाने के लिए की जाती है। कई परिवारों में महिलाएं इस दिन विशेष पूजा-पाठ करती हैं और दशा माता की कथा भी सुनती हैं। माना जाता है कि इस पूजा से परिवार की आर्थिक और मानसिक स्थिति में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि अनेक क्षेत्रों में यह व्रत लंबे समय से पारंपरिक रूप से मनाया जाता रहा है।

व्रत का पालन और पूजा की परंपरा

दशा माता व्रत मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं करती हैं। वे पूरे दिन श्रद्धा के साथ पूजा करती हैं और अपने परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं एक साथ समूह में बैठकर दशा माता की कथा सुनती हैं। पूजा के दौरान माता की प्रतिमा या प्रतीक स्वरूप पूजा सामग्री को स्थापित किया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से आराधना की जाती है। पूजा पूरी होने पर महिलाएं अपने परिवार के लिए मंगलकामना करती हैं और घर में सुख-शांति बनी रहने की प्रार्थना करती हैं।

पूजा में डोरा पहनने की परंपरा

दशा माता व्रत से जुड़ी एक खास परंपरा डोरा पहनने की भी है। पूजा के समय महिलाएं लाल या कच्चे सूत से बना धागा तैयार करती हैं। सामान्यतः दस धागों को एक साथ जोड़कर एक डोरा बनाया जाता है और उसमें दस गांठें लगाई जाती हैं। इस डोरे को पहले पूजा स्थल पर माता के सामने रखा जाता है और पूजा के बाद इसे आशीर्वाद स्वरूप पहन लिया जाता है। कई महिलाएं इसे लंबे समय तक धारण करती हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह डोरा घर में सुख-समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने का प्रतीक माना जाता है।

व्रत समाप्ति की परंपरा

व्रत के समापन के बाद कई स्थानों पर दशा माता की प्रतिमा या पूजा में प्रयुक्त प्रतीक को जल में विसर्जित करने की परंपरा भी निभाई जाती है। विसर्जन से पहले माता का श्रृंगार कर विशेष पूजा की जाती है। डोरे को कुछ लोग पूरे वर्ष तक पहनकर रखते हैं, जबकि कुछ लोग वैशाख माह में किसी शुभ दिन इसे उतारते हैं। पारंपरिक मान्यता के अनुसार यह डोरा परिवार में सुख-शांति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

व्रत के दौरान रखी जाने वाली सावधानियां

दशा माता व्रत के दौरान खान-पान से जुड़ी कुछ परंपराएं भी निभाई जाती हैं। कई स्थानों पर महिलाएं मीठे भोजन का व्रत रखती हैं और दिन में एक समय भोजन करती हैं। कुछ लोग एक समय गेहूं से बना भोजन ग्रहण करते हैं। पूजा सामान्यतः पीपल के पेड़ के पास की जाती है, जिसे धार्मिक दृष्टि से पवित्र माना जाता है। कई जगह महिलाएं एकत्र होकर कथा सुनती हैं और सामूहिक रूप से पूजा करती हैं। इस तरह यह व्रत केवल धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि सामाजिक और पारिवारिक परंपराओं से भी जुड़ा हुआ माना जाता है।

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