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Jyoti Chauhan Free Education Mission: शिक्षा की मशाल थामे अकेले ही निकल पड़ीं बरेली की ज्योति, पेड़ के नीचे चला रही हैं ‘उम्मीद की पाठशाला’

Jyoti Chauhan Free Education Mission: बरेली के करेली गांव की 24 वर्षीय ज्योति चौहान आज उन हजारों युवाओं के लिए मिसाल बन चुकी हैं, जो संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं। ज्योति ने यह साबित कर दिया है कि अगर नेक इरादे और मजबूत नीयत हो, तो शिक्षा के प्रकाश को फैलने से कोई नहीं रोक सकता। पिछले सात वर्षों से ज्योति भीमसेन मंदिर परिसर में एक पुराने पेड़ के नीचे अपनी पाठशाला लगा रही हैं। (Inspiring Social Worker Story) के रूप में उनकी पहचान अब पूरे जिले में फैल चुकी है। उनके इस निस्वार्थ भाव ने न केवल गांव के बच्चों का भविष्य संवारा है, बल्कि शिक्षा को लेकर एक नई चेतना भी जगाई है।

Jyoti Chauhan Free Education Mission
Jyoti Chauhan Free Education Mission

संघर्षों के साये में बीता ज्योति का बचपन

आठ भाई-बहनों के बड़े परिवार में सबसे छोटी ज्योति का जीवन कभी आसान नहीं रहा। उनकी मां का साया बचपन में ही उठ गया था और पिता रामपाल सिंह चौहान, जो सिंचाई विभाग में ऑपरेटर थे, 12 साल पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। सीमित पेंशन में इतने बड़े परिवार का गुजारा करना एक बड़ी चुनौती थी। (Overcoming Financial Hardships) के बावजूद ज्योति ने हार नहीं मानी। इंटर के बाद जब बीएससी की फीस भरने के पैसे नहीं थे, तब उन्होंने एक निजी स्कूल में मात्र 2,500 रुपये की नौकरी की और ट्यूशन पढ़ाकर अपनी उच्च शिक्षा का रास्ता साफ किया।

रक्षपाल बहादुर इंस्टीट्यूट की शिक्षिका ने बढ़ाया हाथ

ज्योति की लगन को देखते हुए रक्षपाल बहादुर इंस्टीट्यूट की एक शिक्षिका ने उनकी आर्थिक स्थिति को समझा और उनके कॉलेज की फीस जमा कराई। इस मदद ने ज्योति के मन में यह संकल्प पैदा किया कि वह भी समाज के लिए कुछ करेंगी। (Free Education for Poor Children) का उनका अभियान इसी सोच का परिणाम है। वह मानती हैं कि गरीबी किसी भी बच्चे की प्रगति में बाधा नहीं बननी चाहिए। इसी विश्वास के साथ उन्होंने मंदिर परिसर को अपनी कर्मभूमि बनाया और उन बच्चों को शिक्षा से जोड़ा जो स्कूल नहीं जा पा रहे थे।

120 बच्चों के भविष्य को संवारती अनोखी पाठशाला

आज ज्योति की इस खुली पाठशाला में कक्षा एक से आठ तक के करीब 120 बच्चे नियमित रूप से पढ़ने आते हैं। इनमें से ज्यादातर बच्चे उन परिवारों से हैं जो मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं। (Education for Underprivileged Kids) को अपना लक्ष्य बना चुकी ज्योति न केवल इन बच्चों को किताबी ज्ञान देती हैं, बल्कि अपनी सीमित आय से उनके लिए पेन, कॉपी, दरी और ब्लैकबोर्ड जैसे बुनियादी सामान का इंतजाम भी खुद ही करती हैं। वह बच्चों को सिखाती हैं कि शिक्षा ही वह एकमात्र औजार है जो गरीबी के चक्रव्यूह को तोड़ सकता है।

2018 से शुरू हुआ यह निस्वार्थ सफर

ज्योति ने इस शिक्षण अभियान की शुरुआत साल 2018 में की थी। शुरुआत में बच्चों की संख्या कम थी, लेकिन धीरे-धीरे यह आंकड़ा 320 तक पहुंच गया था। हालांकि, कोरोना काल की महामारी के दौरान (Challenges in Rural Education) के कारण कक्षाएं कुछ समय के लिए बाधित हुईं। महामारी के बाद ज्योति ने फिर से नई ऊर्जा के साथ शुरुआत की। संसाधनों की कमी के बावजूद उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि बच्चों का पढ़ाई से नाता न टूटे। आज यह पाठशाला न केवल एक स्कूल है, बल्कि गांव के गरीब परिवारों के लिए उम्मीद का एक केंद्र बन गई है।

समाजसेवियों और संस्थाओं का मिला साथ

ज्योति के इस नेक कार्य को देखते हुए समय-समय पर कुछ समाजसेवी संस्थाएं भी मदद के लिए आगे आती हैं। (Community Support for Education) के जरिए बच्चों को सर्दियों में गर्म कपड़े, जूते और स्टेशनरी का सामान उपलब्ध कराया जाता है। हालांकि ज्योति को अभी भी एक पक्के कमरे और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत महसूस होती है, ताकि खराब मौसम में भी बच्चों की पढ़ाई बाधित न हो। समाज का यह छोटा-सा सहयोग ज्योति के हौसलों को और अधिक उड़ान देता है।

खुद की आंखों में भी है पीसीएस बनने का सपना

बच्चों को बड़े सपने देखने की प्रेरणा देने वाली ज्योति खुद भी एक बड़े लक्ष्य की ओर बढ़ रही हैं। वह कड़ी मेहनत के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रही हैं और एक (PCS Officer Career Goal) अधिकारी बनना चाहती हैं। उनका मानना है कि प्रशासनिक सेवा में जाकर वह सरकारी तंत्र का हिस्सा बनकर शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव ला सकेंगी। उनकी दिनचर्या बेहद थकाऊ होती है, लेकिन बच्चों की आंखों में चमक और उनके सीखने की ललक ज्योति की सारी थकान मिटा देती है।

हर गांव में एक ‘ज्योति’ की जरूरत

ज्योति चौहान की यह कहानी हमें सिखाती है कि बदलाव लाने के लिए बड़े फंड की नहीं, बल्कि बड़े दिल की जरूरत होती है। (Social Change through Education) के इस अभियान ने करेली गांव की तस्वीर बदल दी है। ज्योति का सपना है कि उनके आसपास का कोई भी बच्चा सिर्फ इसलिए अनपढ़ न रह जाए कि उसके पास पैसे नहीं हैं। उनका यह संघर्ष समाज के हर सक्षम व्यक्ति को यह संदेश देता है कि हमें अपनी सफलताओं का कुछ हिस्सा उन लोगों को भी देना चाहिए जो कतार में सबसे पीछे खड़े हैं।

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