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Saas Bahu Relationship: बिखरते परिवारों की अनकही दास्तान, जानें क्या सास-बहू की जंग में छिन रहा है घर का सुकून…

Saas Bahu Relationship: भारतीय समाज में सास और बहू का रिश्ता परिवार की नींव माना जाता है, जो पूरे घर को एक सूत्र में पिरोकर रखता है। अगर इस पवित्र बंधन में प्यार और आपसी समझ की महक हो, तो घर स्वर्ग बन जाता है, लेकिन इसके विपरीत यदि मनमुटाव पैदा हो जाए, तो हंसता-खेलता (family peace) पूरी तरह नष्ट हो जाता है। अक्सर समाज में यह बहस छिड़ी रहती है कि घर टूटने के पीछे आखिर कौन अधिक जिम्मेदार है, मगर मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सच किसी एक पक्ष के पक्षपात से कहीं अधिक गहरा और जटिल है।

Saas Bahu Relationship
Saas Bahu Relationship

साइकोलॉजिस्ट की नजर में जिम्मेदारी का बंटवारा

विख्यात साइकोलॉजिस्ट डॉ. माला वोहरा खन्ना (Saas Bahu Relationship) के अनुसार, किसी भी विवाद के लिए केवल एक व्यक्ति को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं है। जब एक सुखी परिवार टूटने की कगार पर आता है, तो उसकी जिम्मेदारी (shared responsibility) के तहत सास और बहू दोनों पर ही आती है। यह कहना कि केवल सास गलत है या केवल बहू ने घर तोड़ा, एक तरफा सोच होगी। असल में, यह दोनों के बीच तालमेल की कमी और एक-दूसरे के दृष्टिकोण को न समझ पाने का परिणाम होता है।

मां और बेटे के गहरे भावनात्मक जुड़ाव का सच

एक मां के लिए उसका बेटा उसकी पूरी दुनिया होता है, जिसे पालने में वह अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष समर्पित कर देती है। शादी के बाद जब बेटे के जीवन में एक नई महिला का प्रवेश होता है, तो कई बार मां के अवचेतन मन में (emotional insecurity) की भावना जन्म लेने लगती है। उन्हें डर सताने लगता है कि अब उनकी प्राथमिकता कम हो जाएगी या बेटा उनसे दूर हो जाएगा। यही डर धीरे-धीरे जलन और फिर घरेलू कलह का रूप धारण कर लेता है, जिससे तनाव बढ़ता है।

सास के लिए बदलाव को स्वीकार करने की चुनौती

रिश्तों में संतुलन बनाए रखने के लिए सास को यह स्वीकार करना होगा कि उनके बेटे की जिंदगी में अब उसकी पत्नी का स्थान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डॉ. माला का मानना है कि यदि सास अपनी (insecurity issues) पर नियंत्रण पा लें और यह समझें कि बेटे का अपनी पत्नी से प्रेम करना उनके प्रति अनादर नहीं है, तो आधी समस्याएं स्वतः ही हल हो सकती हैं। मां की ममता को इनसिक्योरिटी के बजाय आशीर्वाद की तरह फलना-फूलना चाहिए ताकि घर का ढांचा मजबूत रहे।

बहू का दृष्टिकोण और नए परिवार में सामंजस्य

जिस तरह एक बेटी अपनी मां से जुड़ी होती है, उसी तरह एक पुरुष का अपनी माता के प्रति लगाव भी पूरी तरह स्वाभाविक है। बहू को यह समझना चाहिए कि पति और उसकी मां का (emotional bond) अटूट है और इसे तोड़ने की कोशिश करना रिश्तों में जहर घोलने जैसा है। यदि बहू इस भावनात्मक सच्चाई को सम्मान दे और सास के प्रति सहानुभूति रखे, तो ससुराल में उसके लिए प्यार और सम्मान के रास्ते खुद-ब-खुद खुल जाते हैं।

अधिकार की भावना और रिश्तों में टकराव की वजह

कई बार नई नवेली बहू को लगता है कि शादी के बाद उसके पति पर केवल उसी का अधिकार है, जो कि एक (unrealistic expectation) साबित होती है। पति को केवल अपनी संपत्ति समझना और उसे परिवार से काटने की कोशिश करना अक्सर विवादों को जन्म देता है। अगर बहू सास को प्रतिद्वंदी न मानकर उन्हें परिवार का एक मार्गदर्शक और अहम हिस्सा स्वीकार कर ले, तो घर के माहौल में अपनापन और सकारात्मकता बनी रहती है।

आपसी स्पेस और मर्यादा की अहमियत

किसी भी स्वस्थ रिश्ते की सबसे पहली शर्त एक-दूसरे को ‘स्पेस’ देना होती है। सास और बहू दोनों को ही अपनी सीमाओं को पहचानना चाहिए और एक-दूसरे की निजी जिंदगी में (personal space) का सम्मान करना चाहिए। हर छोटे फैसले में दखल देना या एक-दूसरे की गलतियां निकालना रिश्तों की डोर को कमजोर कर देता है। सास को चाहिए कि वह बहू को घर के निर्णयों में अपनी पहचान बनाने का मौका दें, वहीं बहू को भी सास के उम्र और तजुर्बे का लोहा मानना चाहिए।

सम्मान और समझदारी से बुना रिश्तों का ताना-बाना

अंततः, एक छत के नीचे शांति से रहने के लिए अहंकार को त्यागना अनिवार्य है। जब सास अपनी बहू को बेटी जैसा दर्जा और बहू अपनी सास को मां जैसा (mutual respect) प्रदान करती है, तभी परिवार का अस्तित्व सुरक्षित रहता है। घर को मंदिर बनाने के लिए संवाद का सहारा लेना चाहिए न कि विवाद का। यदि दोनों पक्ष समझदारी दिखाएं, तो कड़वाहट को खत्म कर फिर से खुशियों भरा आशियाना बसाया जा सकता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बने।

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