RAWChief – अमेरिका-ईरान वार्ता में पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल
RAWChief – अमेरिका और ईरान के बीच संभावित वार्ता को लेकर जारी कूटनीतिक हलचल के बीच भारत की खुफिया एजेंसी के पूर्व प्रमुख विक्रम सूद ने पाकिस्तान की भूमिका पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका उतनी प्रभावशाली नहीं है, जितनी बताई जा रही है। उनके मुताबिक, इस्लामाबाद मुख्य रूप से बातचीत के लिए स्थान उपलब्ध कराने तक सीमित है, न कि किसी सक्रिय मध्यस्थ की तरह काम कर रहा है।

केवल स्थान उपलब्ध कराने तक सीमित भूमिका
एक इंटरव्यू के दौरान विक्रम सूद ने स्पष्ट किया कि पाकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल नहीं है। उन्होंने कहा कि बातचीत के लिए एक मंच उपलब्ध कराना ही उसकी मुख्य भूमिका है। उनके अनुसार, पाकिस्तान न तो वार्ता की दिशा तय कर रहा है और न ही किसी तरह की निगरानी कर रहा है।
तटस्थता पर उठे सवाल
पूर्व खुफिया प्रमुख ने पाकिस्तान की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए। उनका मानना है कि भले ही वह बातचीत के लिए एक मंच उपलब्ध करा रहा हो, लेकिन उसे पूरी तरह तटस्थ कहना मुश्किल है। उन्होंने संकेत दिया कि अमेरिका के साथ पाकिस्तान के संबंध इस भूमिका को प्रभावित कर सकते हैं।
ईरान के भरोसे को लेकर अनिश्चितता
जब यह सवाल उठा कि क्या ईरान पाकिस्तान पर भरोसा कर सकता है, तो सूद ने इस पर संदेह जताया। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक और धार्मिक मतभेद रहे हैं, जो भरोसे की कमी की वजह बन सकते हैं। खासकर शिया और सुन्नी समुदायों के बीच की जटिलताओं को उन्होंने एक महत्वपूर्ण कारक बताया।
क्षेत्रीय संतुलन में पाकिस्तान की स्थिति
मध्य पूर्व के संदर्भ में उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के संबंध कई शिया बहुल देशों के साथ सीमित हैं। इससे क्षेत्रीय स्तर पर उसकी स्थिति कुछ हद तक अलग-थलग दिखाई देती है। ऐसे में उसकी मध्यस्थता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
पाकिस्तानी राजदूत का पक्ष
वहीं, अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत ने भी स्वीकार किया है कि बातचीत को आगे बढ़ाने के प्रयास जारी हैं, लेकिन यह प्रक्रिया जटिल है और इसमें समय लग सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान केवल एक सहयोगी की भूमिका निभा रहा है, जबकि अंतिम निर्णय अमेरिका और ईरान को ही लेना है।
बातचीत की प्रक्रिया में चुनौतियां
राजदूत के अनुसार, ईरान की मौजूदा परिस्थितियों के कारण संचार में दिक्कतें आ रही हैं, जिससे वार्ता की गति प्रभावित हो रही है। यही वजह है कि कई बार समय सीमा को आगे बढ़ाना पड़ा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस पूरी प्रक्रिया में कई व्यावहारिक चुनौतियां भी मौजूद हैं।
अमेरिकी पक्ष की प्रतिक्रिया
इससे पहले अमेरिकी नेतृत्व की ओर से भी बातचीत में प्रगति का संकेत दिया गया था। हालांकि, संभावित समझौते या युद्धविराम को लेकर कोई स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। फिलहाल, यह प्रक्रिया कूटनीतिक स्तर पर जारी है और इसके परिणाम पर सभी की नजर बनी हुई है।