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SheetalaAshtami – होली के बाद मनाया जाएगा शीतला अष्टमी व्रत, जानें पूजा का समय और परंपरा

SheetalaAshtami – होली के बाद आने वाले धार्मिक पर्वों में शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी का विशेष महत्व माना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी और अष्टमी तिथि पर शीतला माता की पूजा और व्रत रखा जाता है। कई क्षेत्रों में यह व्रत सप्तमी को मनाया जाता है, जबकि कुछ स्थानों पर अष्टमी के दिन पूजा की परंपरा है। इस वर्ष यह पर्व 10 और 11 मार्च को मनाया जा रहा है। इस दिन श्रद्धालु माता शीतला की पूजा कर परिवार की सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता को शीतलता और रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है, इसलिए इस दिन विशेष नियमों के साथ व्रत और पूजा की जाती है।

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शीतला अष्टमी की तिथि और पूजा का समय

पंचांग के अनुसार चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 10 मार्च की रात 1 बजकर 54 मिनट से शुरू होकर 11 मार्च की रात 4 बजकर 19 मिनट तक रहेगी। व्रत और पूजा में उदया तिथि को प्रमुख माना जाता है, इसलिए इस वर्ष शीतला अष्टमी का व्रत 11 मार्च, बुधवार को रखा जाएगा। इस दिन सुबह से लेकर शाम तक पूजा का शुभ समय रहेगा। मान्यता है कि श्रद्धा और विधि-विधान से की गई पूजा से माता शीतला की कृपा प्राप्त होती है और परिवार पर आने वाली बीमारियों और कष्टों से रक्षा होती है।

शीतला माता की पूजा से जुड़ी मान्यताएं

धार्मिक परंपराओं में शीतला माता को विशेष रूप से रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। लोक मान्यता है कि माता शीतला दाहज्वर, बुखार, त्वचा संबंधी रोग और आंखों से जुड़ी बीमारियों से बचाव का आशीर्वाद देती हैं। यही कारण है कि चैत्र मास की सप्तमी और अष्टमी तिथि को उनका पूजन महत्वपूर्ण माना जाता है। देवी की प्रतिमा या चित्र में उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है। उनके हाथों में कलश, झाड़ू और सूप का प्रतीकात्मक स्वरूप दर्शाया जाता है, जबकि गले में नीम के पत्तों की माला होती है। इन प्रतीकों को स्वच्छता, स्वास्थ्य और रोगों से सुरक्षा का संकेत माना जाता है।

ठंडे भोजन का भोग लगाने की परंपरा

शीतला अष्टमी से जुड़ी एक विशेष परंपरा यह है कि इस दिन माता को गर्म भोजन का भोग नहीं लगाया जाता। पूजा के लिए भोजन एक दिन पहले ही तैयार कर लिया जाता है और अगले दिन ठंडा या बासी भोजन देवी को अर्पित किया जाता है। इसी कारण कई क्षेत्रों में इस पर्व को बसौड़ा भी कहा जाता है। श्रद्धालु भी इस दिन ठंडा भोजन ग्रहण करते हैं। मान्यता है कि मौसम बदलने के समय इस प्रकार का भोजन शरीर को संतुलित रखने में मदद करता है। चैत्र का महीना वह समय होता है जब सर्दी का मौसम समाप्त होने लगता है और गर्मी की शुरुआत होती है। ऐसे समय में मौसम के बदलाव के कारण लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर पड़ सकती है, इसलिए खान-पान में सावधानी रखने की परंपरा भी इस पर्व से जुड़ी मानी जाती है।

शीतला अष्टमी व्रत से जुड़ी कथा

धार्मिक कथाओं के अनुसार एक बार माता शीतला ने यह जानने का विचार किया कि पृथ्वी पर लोग उन्हें कितनी श्रद्धा से याद करते हैं। इसी उद्देश्य से वह साधारण रूप में धरती पर आईं और एक गांव में घूमने लगीं। वहां एक व्यक्ति ने उन्हें गर्म भोजन दे दिया, जिससे उनका मुख जल गया और उन्हें कष्ट होने लगा। वह सहायता की तलाश में इधर-उधर भटकती रहीं। उसी समय एक वृद्ध महिला ने उनकी स्थिति देखकर उन्हें अपने घर बुलाया। उसने माता को आराम से बैठाया, उन्हें हवा की और ठंडा भोजन तथा दही खाने के लिए दिया। ठंडा भोजन करने के बाद माता की पीड़ा कम हो गई। तब उन्होंने उस महिला को अपने वास्तविक रूप में दर्शन दिए और उसे आशीर्वाद दिया।

कहा जाता है कि उसी घटना के बाद से शीतला अष्टमी के दिन ठंडे भोजन का भोग लगाने की परंपरा शुरू हुई। तब से हर वर्ष चैत्र कृष्ण पक्ष की अष्टमी को श्रद्धालु शीतला माता की पूजा करते हैं और ठंडे भोजन का प्रसाद चढ़ाते हैं। यह पर्व स्वास्थ्य, स्वच्छता और मौसम परिवर्तन के दौरान सावधानी बरतने की परंपराओं से भी जुड़ा माना जाता है।

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