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AirPollution – दिल्ली में ऊंची इमारतों पर ज्यादा पाया गया पीएम 2.5 स्तर

AirPollution – दिल्ली में वायु प्रदूषण को लेकर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने शहरी हवा की गुणवत्ता से जुड़ी एक अहम बात सामने रखी है। शोध में पाया गया है कि धुंध भरी सुबह के समय जमीन से करीब 100 मीटर की ऊंचाई पर पीएम 2.5 कणों की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है। इसका मतलब यह है कि बहुमंजिला इमारतों में रहने या काम करने वाले लोग कभी-कभी जमीन के स्तर पर रहने वालों की तुलना में अधिक प्रदूषित हवा के संपर्क में आ सकते हैं। यह निष्कर्ष एक अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में सामने आया है, जिसमें आधुनिक तकनीक की मदद से हवा की ऊपरी परतों का विश्लेषण किया गया।

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ऊंचाई पर प्रदूषण मापने के लिए ड्रोन तकनीक का उपयोग

इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों को अलग-अलग ऊंचाइयों पर मापने के लिए विशेष सेंसर से लैस ड्रोन का इस्तेमाल किया। आमतौर पर शहरों में लगाए जाने वाले पारंपरिक मॉनिटरिंग सिस्टम जमीन से लगभग चार से पांच मीटर की ऊंचाई तक ही प्रदूषण का आकलन कर पाते हैं। इससे ऊपर की हवा में मौजूद कणों की सटीक जानकारी नहीं मिल पाती।

ड्रोन के माध्यम से वैज्ञानिकों ने जमीन से कई दर्जन मीटर ऊपर तक हवा के नमूने एकत्र किए और उनका विश्लेषण किया। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक भाषा में वर्टिकल प्रोफाइलिंग कहा जाता है। इस तरीके से यह समझने में मदद मिलती है कि अलग-अलग ऊंचाइयों पर हवा की गुणवत्ता किस तरह बदलती है। अध्ययन से यह भी संकेत मिला कि पारंपरिक मॉनिटरिंग के अलावा ऐसे नए तरीकों का उपयोग भविष्य में वायु गुणवत्ता आकलन को अधिक सटीक बना सकता है।

अध्ययन में सामने आया ऊंचाई और प्रदूषण का अंतर

शोधकर्ताओं ने दक्षिण दिल्ली के एक क्षेत्र में मार्च 2021 के दौरान कई दिनों तक ड्रोन उड़ाकर आंकड़े जुटाए। धुंध वाली सुबह के समय जमीन से करीब 100 मीटर की ऊंचाई पर पीएम 2.5 का स्तर लगभग 160 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। उसी समय जमीन के पास यह स्तर लगभग 100 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था।

यह अंतर दर्शाता है कि कुछ मौसमीय परिस्थितियों में हवा की ऊपरी परतों में प्रदूषक कण ज्यादा मात्रा में जमा हो सकते हैं। खासकर 20 से 30 मंजिला इमारतों की ऊपरी मंजिलों पर रहने वाले लोगों के लिए यह स्थिति महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि वे सीधे उस परत के संपर्क में आते हैं जहां प्रदूषण अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है।

मौसमीय परिस्थितियां भी निभाती हैं अहम भूमिका

विशेषज्ञों के अनुसार हवा में प्रदूषण का स्तर सिर्फ उत्सर्जन स्रोतों पर ही निर्भर नहीं करता, बल्कि मौसम की स्थितियां भी इसे काफी प्रभावित करती हैं। तापमान में बदलाव, हवा की गति, नमी और आसपास के प्रदूषण स्रोत जैसे कारक मिलकर हवा की अलग-अलग परतों में कणों के जमाव को प्रभावित करते हैं।

अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने सुबह के समय तापमान उलटाव यानी टेम्परेचर इंवर्जन की स्थिति देखी। इस स्थिति में जमीन के पास की ठंडी हवा ऊपर नहीं उठ पाती और उसके ऊपर गर्म हवा की परत बन जाती है। इसके कारण प्रदूषक कण एक निश्चित ऊंचाई के आसपास जमा होने लगते हैं। नमी बढ़ने से इन कणों का आकार भी बढ़ सकता है, जिससे हवा में धुंध अधिक दिखाई देती है।

ड्रोन और पारंपरिक मॉनिटरिंग के आंकड़ों की तुलना

शोधकर्ताओं ने ड्रोन से प्राप्त डेटा की विश्वसनीयता जांचने के लिए उसे पारंपरिक उपकरणों से मापे गए आंकड़ों से भी मिलाया। इसके लिए बीटा अटेन्यूएशन मॉनिटर नामक उपकरण का उपयोग किया गया, जिसे एक इमारत की ऊपरी मंजिल के बराबर ऊंचाई पर स्थापित किया गया था।

ड्रोन सेंसर और इस उपकरण से प्राप्त रीडिंग में काफी समानता पाई गई। इससे यह संकेत मिलता है कि ड्रोन आधारित तकनीक हवा की गुणवत्ता मापने के लिए एक भरोसेमंद पूरक माध्यम बन सकती है। शोधकर्ताओं ने ड्रोन के डिजाइन में भी कई तकनीकी बदलाव किए ताकि हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों का मापन अधिक सटीक हो सके।

बड़े शहरों के लिए कम लागत वाली तकनीक

वैज्ञानिकों का मानना है कि ड्रोन आधारित निगरानी प्रणाली खासकर विकासशील देशों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। पारंपरिक वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित करने में काफी खर्च आता है और इन्हें संचालित करने के लिए पर्याप्त संसाधनों की आवश्यकता होती है।

इसके विपरीत, सेंसर से लैस ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत में तैयार किए जा सकते हैं और इन्हें अलग-अलग स्थानों पर आसानी से उड़ाकर डेटा एकत्र किया जा सकता है। इससे उन शहरों में भी वायु गुणवत्ता का आकलन बेहतर तरीके से किया जा सकता है जहां मॉनिटरिंग नेटवर्क सीमित है।

विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रोन प्रणाली पारंपरिक मॉनिटरिंग का विकल्प नहीं है, बल्कि इसे और मजबूत बनाने का एक अतिरिक्त माध्यम है। यदि दोनों तकनीकों का साथ में उपयोग किया जाए तो शहरों में प्रदूषण की वास्तविक स्थिति को अधिक सटीक रूप से समझा जा सकता है।

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