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Assam Assembly Elections 2026 Ticket Strategy: क्या कांग्रेस में अब केवल अमीर ही लड़ पाएंगे चुनाव, टिकट के लिए 50,000 की शर्त ने मचाया कोहराम…

Assam Assembly Elections 2026 Ticket Strategy: असम में 2026 के विधानसभा चुनावों की आहट अभी दूर है, लेकिन राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच चुकी है। राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने चुनाव जीतने के लिए अपनी कमर कस ली है, लेकिन इसी बीच एक ऐसा निर्देश जारी हुआ है जिसने कार्यकर्ताओं के बीच हलचल पैदा कर दी है। पार्टी ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई भी (Assam Congress ticket aspirants) बनना चाहता है, तो उसे पहले अपनी आर्थिक क्षमता का प्रमाण देना होगा।

Assam Assembly Elections 2026 Ticket Strategy
Assam Assembly Elections 2026 Ticket Strategy

टिकट की रेस में शामिल होने के लिए चुकानी होगी भारी कीमत

द ट्रिब्यून के हाथ लगे एक आधिकारिक सर्कुलर के अनुसार, असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (APCC) ने टिकट के दावेदारों के लिए एक अनिवार्य शर्त रखी है। इस बार केवल वही व्यक्ति आवेदन कर सकेगा जो (mandatory application fee for candidates) के रूप में 50,000 रुपये की भारी-भरकम राशि जमा करेगा। यह निर्देश सीधे तौर पर उन कार्यकर्ताओं के लिए एक चुनौती बन गया है जो वर्षों से जमीन पर पार्टी के लिए पसीना बहा रहे हैं।

समय सीमा और आवेदन की सख्त प्रक्रिया का खुलासा

कांग्रेस ने इस आवेदन प्रक्रिया के लिए बहुत ही कम समय दिया है, जिससे दावेदारों में अफरा-तफरी का माहौल है। पार्टी की ओर से जारी (circular for Assam elections 2026) के मुताबिक, आवेदन केवल 5 जनवरी से 20 जनवरी के बीच ही स्वीकार किए जाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि केवल वही आवेदन स्क्रीनिंग कमेटी तक पहुंचेंगे जिनके साथ APCC के नाम से बना डिमांड ड्राफ्ट संलग्न होगा, अन्यथा उन्हें रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाएगा।

प्रियंका गांधी वाड्रा के कंधों पर उम्मीदवारों के चयन का भार

इस बार असम में टिकटों के बंटवारे और स्क्रीनिंग की पूरी जिम्मेदारी पार्टी की फायरब्रांड नेता प्रियंका गांधी वाड्रा को सौंपी गई है। प्रियंका गांधी की अध्यक्षता में (Assam Congress screening committee) का गठन किया गया है, जिसमें साप्तगिरी शंकर उलाका, इमरान मसूद और सिरिवेल्ला प्रसाद जैसे कद्दावर नेता शामिल हैं। प्रियंका का नेतृत्व कार्यकर्ताओं में जोश तो भर रहा है, लेकिन 50,000 रुपये वाली शर्त ने इस जोश पर थोड़ा पानी फेर दिया है।

गौरव गोगोई का निर्देश और पार्टी के भीतर उठते विरोध के स्वर

यह पूरा फैसला APCC अध्यक्ष गौरव गोगोई के निर्देश पर लिया गया है, जिसे पार्टी ‘आवेदन शुल्क’ का नाम दे रही है। हालांकि, संगठन के भीतर दबी जुबान में (internal dissent in Congress) शुरू हो गया है। कई नेताओं का मानना है कि इतनी बड़ी रकम मांगना उन निष्ठावान कार्यकर्ताओं के साथ अन्याय है जो आर्थिक रूप से संपन्न नहीं हैं लेकिन जनता के बीच मजबूत पकड़ रखते हैं।

अन्य राज्यों की तुलना में असम का शुल्क है सबसे ज्यादा

जब हम अन्य राज्यों में कांग्रेस की टिकट वितरण नीति को देखते हैं, तो असम का मामला बिल्कुल अलग नजर आता है। उदाहरण के लिए, 2024 के आंध्र प्रदेश चुनाव में (Congress candidate reservation policy) के तहत आरक्षित वर्ग के लिए शुल्क काफी कम था, लेकिन असम में बिना किसी भेदभाव के सभी से एकसमान 50,000 रुपये मांगे गए हैं। हरियाणा में भी महिलाओं और पिछड़ा वर्ग के लिए शुल्क मात्र 5,000 रुपये था, जो असम की तुलना में बहुत कम है।

गठबंधन की सीटों पर रिफंड का वादा, मगर स्पष्टता का अभाव

कांग्रेस ने अपने सर्कुलर में यह उल्लेख भी किया है कि कुछ सीटें गठबंधन के सहयोगियों के लिए छोड़ी जा सकती हैं। ऐसे में जो दावेदार शुल्क जमा कर चुके होंगे, उन्हें (candidate fee refund process) के जरिए पैसा लौटाने की बात कही गई है। हालांकि, यह रिफंड कब और कैसे मिलेगा, इसकी कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है, जिससे आवेदन करने वालों के मन में अपनी जमा पूंजी को लेकर डर बैठा हुआ है।

आवेदन जमा करने के लिए निर्धारित किए गए कड़े नियम

टिकट पाने की प्रक्रिया को काफी व्यवस्थित लेकिन जटिल बनाया गया है। दावेदारों को निर्धारित फॉर्म भरने के साथ-साथ एक अंडरटेकिंग और (voter list certification for applicants) की प्रमाणित प्रति भी जमा करनी होगी। आवेदन को न केवल मुख्यालय में जमा करना होगा, बल्कि इसकी प्रतियां जिला और ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षों को भी देनी होंगी, ताकि जमीनी स्तर पर भी दावेदारी की जांच हो सके।

क्या कांग्रेस अब केवल संसाधन-संपन्न नेताओं की पार्टी बन रही है?

पार्टी के भीतर सबसे बड़ा डर यह है कि यह वित्तीय शर्त एक ‘इनफॉर्मल फिल्टर’ का काम करेगी। कार्यकर्ता सवाल उठा रहे हैं कि क्या टिकट की दौड़ अब (political candidates financial capability) पर निर्भर होने वाली है? ऐसे समय में जब कांग्रेस खुद को आम आदमी की पार्टी बताती है, 50,000 रुपये की मांग उसकी जनहितैषी छवि के खिलाफ जाती दिख रही है।

निष्कर्ष: असम की राजनीति में क्या होगा इस फैसले का अंजाम?

असम कांग्रेस की इस नई नीति ने राज्य में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। क्या यह पैसा चुनाव लड़ने के लिए संसाधन जुटाने का जरिया है या फिर पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं को दरकिनार करने की साजिश? प्रियंका गांधी के नेतृत्व वाली (shortlisting process for Assam polls) के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे धनबल के बजाय जनबल वाले उम्मीदवारों को पहचानें और आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी को जीत दिला सकें।

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