BioGasInnovation – सूखी पत्तियों से गैस बनाकर IIT बॉम्बे ने दिखाई नई राह
BioGasInnovation – देशभर में एलपीजी की उपलब्धता को लेकर चुनौतियां सामने आ रही हैं, लेकिन मुंबई स्थित आईआईटी बॉम्बे ने इस समस्या का एक अलग और व्यावहारिक समाधान विकसित किया है। संस्थान ने ऐसी तकनीक अपनाई है, जिसके जरिए कैंपस में सूखी पत्तियों से कुकिंग गैस तैयार की जा रही है। इस नवाचार की वजह से कैंपस में रसोई संचालन पर किसी तरह का असर नहीं पड़ा है और गैस की जरूरत भी काफी हद तक कम हो गई है।

सूखी पत्तियों से ऊर्जा बनाने की अनोखी पहल
आईआईटी बॉम्बे द्वारा विकसित यह तकनीक बायोमास गैसिफिकेशन पर आधारित है। इसमें कैंपस में गिरने वाली सूखी पत्तियों का उपयोग कर गैस बनाई जाती है, जिसे खाना पकाने में इस्तेमाल किया जा सकता है। संस्थान ने इस तकनीक को पेटेंट भी कराया है। पहले जहां इन पत्तियों को निपटाना एक बड़ी चुनौती हुआ करती थी, वहीं अब यही कचरा ऊर्जा का स्रोत बन गया है।
शोध की शुरुआत और शुरुआती चुनौतियां
इस परियोजना की नींव वर्ष 2014 में रखी गई थी, जब केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर संजय महाजनी के नेतृत्व में इस दिशा में काम शुरू हुआ। शुरुआती दौर में तकनीकी दिक्कतें सामने आईं। गैस बनाने की प्रक्रिया के दौरान अत्यधिक धुआं निकलता था, जिससे रसोई में काम करना मुश्किल हो जाता था। इसके अलावा, ठोस अवशेष के कारण सिस्टम के जाम होने जैसी समस्याएं भी आईं। इन चुनौतियों के बावजूद टीम ने लगातार प्रयोग और सुधार जारी रखा।
तकनीकी सुधार से मिली सफलता
लगातार प्रयासों के बाद वर्ष 2016 में एक उन्नत गैसीफायर सिस्टम विकसित किया गया, जिसे पेटेंट भी मिला। इसके बाद इस तकनीक को और बेहतर बनाने के लिए अतिरिक्त शोध किया गया। 2017 में ऊर्जा विज्ञान विभाग के विशेषज्ञ भी इस परियोजना से जुड़े और उन्होंने बर्नर डिजाइन में सुधार किया। कैंपस को ‘लिविंग लैब’ के रूप में इस्तेमाल करते हुए इस तकनीक का परीक्षण किया गया, जिससे इसकी सुरक्षा और उपयोगिता को बेहतर बनाया जा सका।
कैंटीन में सफल उपयोग और सकारात्मक परिणाम
कई चरणों में परीक्षण और सुधार के बाद इस प्रणाली को वर्ष 2024 तक कैंपस की स्टाफ कैंटीन में लागू कर दिया गया। इसका असर यह हुआ कि एलपीजी की खपत में 30 से 40 प्रतिशत तक कमी आई है। इस तकनीक की थर्मल दक्षता करीब 60 प्रतिशत बताई गई है और इसके इस्तेमाल से उत्सर्जन भी काफी कम होता है। इससे न केवल ईंधन की लागत घटती है, बल्कि आपूर्ति बाधित होने की स्थिति में भी रसोई का काम प्रभावित नहीं होता।
पर्यावरण और लागत दोनों में फायदा
इस नवाचार का पर्यावरणीय लाभ भी उल्लेखनीय है। अनुमान है कि इस प्रणाली के उपयोग से हर साल लगभग आठ टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम होता है। साथ ही, संस्थान को ईंधन पर होने वाले खर्च में भी राहत मिली है। यह मॉडल उन संस्थानों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है, जहां बड़ी मात्रा में जैविक कचरा उपलब्ध होता है।
आगे विस्तार की योजना
आईआईटी बॉम्बे अब इस तकनीक को और बड़े स्तर पर लागू करने की योजना बना रहा है। कैंपस के हॉस्टल मेस में बड़ी इकाइयां लगाने की तैयारी की जा रही है, जिससे एलपीजी की खपत और कम की जा सके। अनुमान है कि इस विस्तार के बाद हर साल लाखों रुपये की बचत संभव होगी। यह पहल ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।



