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DNATestCase – बच्चों को सबूत बनाने पर हाईकोर्ट ने लगाई रोक

DNATestCase – आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के आपसी विवादों में बच्चों को किसी भी तरह का साधन नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी की कथित बेवफाई साबित करने के लिए अपने बच्चों के डीएनए परीक्षण की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की मांग न केवल अनुचित है, बल्कि बच्चों के अधिकारों और सम्मान के खिलाफ भी है।

high court rejects children dna test evidence

मामले की पृष्ठभूमि क्या रही

यह मामला उस समय सामने आया जब पति ने तलाक की याचिका दायर करते हुए दावा किया कि उसकी पत्नी पिछले दो वर्षों से उससे अलग रह रही है। इसके साथ ही उसने यह भी आरोप लगाया कि पत्नी के अन्य संबंध थे। इन आरोपों को साबित करने के लिए उसने अपने ही बच्चों के डीएनए टेस्ट की अनुमति मांगी, ताकि यह साबित किया जा सके कि वह उनका जैविक पिता नहीं है।

ट्रायल कोर्ट पहले ही कर चुका था इनकार

इस मामले में निचली अदालत पहले ही बच्चों के डीएनए परीक्षण की अनुमति देने से मना कर चुकी थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उसने अपनी दलील में कहा कि सच्चाई सामने लाने के लिए यह जांच जरूरी है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और ट्रायल कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

न्यायमूर्ति टी आर राव की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि पत्नी पर लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए बच्चों को इस प्रक्रिया में शामिल करना उचित नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि भले ही पति के आरोपों को मान भी लिया जाए, तब भी बच्चों को डीएनए परीक्षण के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, खासकर जब वे इस मामले के पक्षकार नहीं हैं और उन्होंने किसी प्रकार की कानूनी मांग भी नहीं की है।

अन्य सबूत पेश करने का दिया निर्देश

अदालत ने याचिकाकर्ता को यह सलाह दी कि यदि वह अपने आरोपों को साबित करना चाहता है, तो उसे अन्य वैध तरीकों से साक्ष्य प्रस्तुत करने चाहिए। बच्चों को इस विवाद में घसीटना न तो कानूनी रूप से उचित है और न ही नैतिक रूप से स्वीकार्य।

बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा पर जोर

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि ऐसे मामलों में डीएनए या ब्लड टेस्ट कराने से बच्चों की सामाजिक छवि और मानसिक स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। अदालतों ने पहले भी इस तरह के मामलों में सावधानी बरतने की जरूरत बताई है। खासकर तब, जब बच्चे सीधे तौर पर मामले से जुड़े नहीं होते।

मूल याचिका से अलग थी मांग

अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि तलाक की याचिका का आधार पत्नी द्वारा घर छोड़ना बताया गया था, जबकि डीएनए टेस्ट की मांग अवैध संबंधों के आरोपों के आधार पर की गई थी। ऐसे में यह मांग मूल याचिका से जुड़ी हुई नहीं थी, जिसे अदालत ने एक महत्वपूर्ण बिंदु माना।

इस फैसले को परिवारिक मामलों में बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा के दृष्टिकोण से अहम माना जा रहा है। यह स्पष्ट संदेश देता है कि वैवाहिक विवादों में बच्चों को किसी भी तरह के कानूनी दबाव या जांच का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए।

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