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Judiciary and Bar Relations: जजों की कुर्सी पर छलका वकीलों का दर्द, सीजेआई सूर्यकांत के सामने बार एसोसिएशन ने खोल दी सिस्टम की पोल

Judiciary and Bar Relations: दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के मंच से जब अध्यक्ष एन. हरिहरन ने बोलना शुरू किया, तो माहौल पूरी तरह गंभीर हो गया। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत के अभिनंदन समारोह में उन्होंने न्यायपालिका की (appointment process) के उस पहलू पर रोशनी डाली जिसे अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। हरिहरन ने आंकड़ों के जरिए यह समझाने की कोशिश की कि कैसे बेंच और बार के बीच का संतुलन धीरे-धीरे डगमगा रहा है और इसके दूरगामी परिणाम क्या हो सकते हैं।

Judiciary and Bar Relations
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बार की अनदेखी और उठते कड़वे सवाल

दिल्ली हाई कोर्ट बार के अध्यक्ष ने मंच से बहुत ही तार्किक तरीके से अपनी बात रखते हुए बताया कि वर्तमान में लगभग 47,000 अधिवक्ता इस बार में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। लेकिन चिंता का विषय यह है कि पिछले 17 महीनों में इस विशाल अनुभवी समूह से (advocates to judges elevation) के लिए केवल 3 नामों को ही चुना गया है। उन्होंने साफ लहजे में कहा कि यह आंकड़ा बार की क्षमता और उनकी उम्मीदों के बीच की एक बहुत बड़ी खाई को दर्शाता है, जिसे पाटना अनिवार्य है।

अपवाद बनती वकीलों की पदोन्नति

बार एसोसिएशन का तर्क है कि न्यायपालिका में बार से जजों की नियुक्ति का जो पुराना और स्थापित तरीका था, वह अब बदलता हुआ महसूस हो रहा है। हरिहरन ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान (judicial appointments) की स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि वकीलों को जज बनाना अब एक सामान्य नियम की जगह महज एक अपवाद बनकर रह गया है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी व्यक्ति विशेष की नियुक्ति के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि वे पूरी प्रक्रिया में एक ठोस और पारदर्शी संतुलन की मांग कर रहे हैं।

संसाधनों की कमी और फाइलों का अंबार

न्यायाधीशों की कमी और जजों की नियुक्ति के मुद्दों के साथ-साथ बार एसोसिएशन ने कोर्ट के बुनियादी ढांचे पर भी अपनी चिंता जाहिर की। उन्होंने इस बात पर दुख जताया कि उचित (legal infrastructure) और पर्याप्त संसाधनों के अभाव में दिल्ली हाई कोर्ट में मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। जब तक आवश्यक सुविधाएं और पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश नहीं होंगे, तब तक आम आदमी को समय पर न्याय मिलना एक सपना ही बना रहेगा।

सीजेआई सूर्यकांत का सकारात्मक आश्वासन

बार एसोसिएशन की इन तीखी लेकिन जरूरी दलीलों को सुनने के बाद सीजेआई सूर्यकांत ने बेहद संजीदगी और पेशेवर अंदाज में अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने हरिहरन द्वारा उठाए गए सभी (legal fraternity concerns) को पूरी तरह स्वीकार किया और बार को यह भरोसा दिलाया कि न्यायपालिका का सिस्टम समय के साथ इन सभी मुद्दों को प्रभावी ढंग से सुलझा लेगा। सीजेआई का यह आश्वासन वकीलों के बीच एक नई उम्मीद लेकर आया है कि आने वाले समय में उनकी मांगों पर गौर किया जाएगा।

बार के ऐतिहासिक साहस की यादें

अपने संबोधन के दौरान सीजेआई सूर्यकांत ने दिल्ली हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के गौरवशाली इतिहास और उसके संघर्षों की सराहना की। उन्होंने जस्टिस एच.आर. खन्ना के कार्यकाल का जिक्र करते हुए उस दौर को याद किया जब बार ने (constitutional values) की रक्षा के लिए अभूतपूर्व साहस दिखाया था। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे जस्टिस खन्ना के सुपरसेशन के विरोध में प्राण नाथ लेखी को जेल में रहते हुए भी बार का अध्यक्ष चुनकर एक मिसाल पेश की गई थी।

संविधान के रक्षक के रूप में बार की भूमिका

सीजेआई ने इस बात पर जोर दिया कि केवल कोर्ट रूम ही नहीं, बल्कि पेशेवर निकायों को भी हमेशा लोकतंत्र और संविधान के पहरेदार के रूप में कार्य करना चाहिए। उन्होंने दिल्ली बार की तारीफ करते हुए कहा कि इस संस्था ने (judicial independence) को बनाए रखने के लिए समय-समय पर अपनी निष्ठा साबित की है। सीजेआई के अनुसार, एक मजबूत बार ही एक स्वतंत्र न्यायपालिका की आधारशिला होती है और दोनों का मिलकर काम करना न्याय के हित में है।

न्यायपालिका और बार के बीच बढ़ता तालमेल

इस पूरे संवाद का लब्बोलुआब यह रहा कि आने वाले दिनों में नियुक्तियों और कोर्ट की सुविधाओं को लेकर बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। सीजेआई के सकारात्मक रुख ने यह संकेत दिया है कि (legal profession) से जुड़े लोगों की गरिमा और उनके प्रतिनिधित्व को लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर है। अब देखना यह होगा कि 47 हजार वकीलों की इस बार से आगामी नियुक्तियों में कितने और चेहरों को बेंच का हिस्सा बनने का अवसर मिलता है।

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