JudiciaryUpdate – सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर NCERT चैप्टर होगा पुनर्लेखन
JudiciaryUpdate – सुप्रीम कोर्ट में उठे विवाद के बाद केंद्र सरकार ने एनसीईआरटी की कक्षा 8 की एक पाठ्यपुस्तक में शामिल न्यायपालिका से जुड़े अध्याय को दोबारा तैयार कराने का फैसला लिया है। इस संबंध में अदालत को जानकारी देते हुए बताया गया कि एक नई विशेषज्ञ समिति गठित की गई है, जो पूरे विषय को संतुलित और तथ्यपरक तरीके से फिर से लिखेगी। इस आश्वासन के बाद अदालत ने स्वतः संज्ञान मामले का निपटारा कर दिया।

नई समिति में शामिल होंगे पूर्व जज और वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ
सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि इस समिति में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस इंदु मल्होत्रा, पूर्व जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस और पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल को शामिल किया गया है। इन अनुभवी सदस्यों की जिम्मेदारी होगी कि वे पाठ्य सामग्री को इस तरह तैयार करें, जिससे छात्रों को न्यायपालिका की भूमिका की स्पष्ट और संतुलित समझ मिल सके। अदालत ने इस पहल को स्वीकार करते हुए माना कि यह कदम विवाद को सुलझाने की दिशा में उचित है।
किस वजह से शुरू हुआ विवाद
यह मामला ‘एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ (भाग 2) नामक पुस्तक से जुड़ा है, जो कक्षा 8 के लिए तैयार की गई है। इसमें ‘हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका’ शीर्षक अध्याय के भीतर कथित रूप से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ से संबंधित सामग्री शामिल की गई थी। इस विषय को लेकर आपत्ति जताई गई थी कि यह प्रस्तुति संतुलित नहीं है और छात्रों पर गलत प्रभाव डाल सकती है। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने इस मुद्दे को अदालत के सामने उठाया था, जिसके बाद कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और पहले के निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित पुस्तक के उत्पादन और वितरण पर रोक लगा दी थी। साथ ही, एनसीईआरटी के निदेशक और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को नोटिस जारी कर यह पूछा गया था कि विवादित सामग्री की जिम्मेदारी तय क्यों न की जाए। अदालत ने पहले दिए गए स्पष्टीकरण पर भी असंतोष जताया था, क्योंकि उसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि संशोधित सामग्री किन विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई।
पुराने लेखकों से दूरी बनाने का आदेश
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि जिन व्यक्तियों ने विवादित अध्याय तैयार करने में भूमिका निभाई थी, उन्हें भविष्य में इस तरह की शैक्षणिक प्रक्रियाओं से दूर रखा जाए। इसमें प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुपर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार के नाम सामने आए थे। यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि भविष्य में पाठ्यपुस्तकों की गुणवत्ता और निष्पक्षता सुनिश्चित की जा सके।
सोशल मीडिया पर भ्रामक सामग्री को लेकर चेतावनी
मामले के दौरान अदालत ने सोशल मीडिया पर फैल रही गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियों और भ्रामक सामग्री पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि ऐसे प्लेटफॉर्म और व्यक्तियों की पहचान कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून व्यवस्था को कमजोर करने वाली गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि नई समिति द्वारा तैयार किया गया संशोधित अध्याय छात्रों के लिए अधिक संतुलित, तथ्याधारित और जिम्मेदार दृष्टिकोण प्रस्तुत करेगा।



