JudiciaryUpdate – सुप्रीम कोर्ट टिप्पणी के बाद जस्टिस भाटिया ने जमानत मामलों से बनाई दूरी
JudiciaryUpdate – इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस पंकज भाटिया ने शुक्रवार को एक जमानत याचिका की सुनवाई से स्वयं को अलग कर लिया। उन्होंने खुली अदालत में कहा कि हाल में सुप्रीम कोर्ट द्वारा की गई टिप्पणियों का उन पर मानसिक प्रभाव पड़ा है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि भविष्य में उन्हें जमानत मामलों की रोस्टर जिम्मेदारी न दी जाए। यह घटनाक्रम न्यायिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है।

न्यायालय से अलग होने का निर्णय
जस्टिस भाटिया ने जिस जमानत याचिका से खुद को अलग किया, उसे किसी अन्य पीठ को सौंपने के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया। अपने आदेश में उन्होंने स्पष्ट किया कि मौजूदा परिस्थितियों में इस मामले की सुनवाई करना उनके लिए उचित नहीं होगा। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि किसी भी न्यायाधीश के आदेश की समीक्षा या उसे बदलने का अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है, लेकिन हालिया टिप्पणियों के कुछ अंशों ने उन्हें निराश किया है।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का संदर्भ
दरअसल, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने उनके एक जमानत आदेश पर कड़ी टिप्पणी की थी। शीर्ष अदालत की पीठ ने उस आदेश को हाल के समय में देखे गए “सबसे चौंकाने वाले और निराशाजनक” आदेशों में से एक बताया था। सर्वोच्च अदालत का कहना था कि आदेश पढ़ने से यह स्पष्ट नहीं होता कि आरोपी को जमानत देने के लिए किस आधार पर न्यायिक विवेक का उपयोग किया गया। यह टिप्पणी न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्पष्ट तर्क की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
दहेज मृत्यु से जुड़ा था मूल मामला
जिस आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी, वह दहेज मृत्यु के एक गंभीर मामले से संबंधित था। इस मामले में आरोपी को हाई कोर्ट से जमानत मिली थी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन शामिल थे, ने कहा था कि हाई कोर्ट के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आरोपी के पक्ष में विवेकाधिकार क्यों और कैसे प्रयोग किया गया। अदालत ने यह भी कहा कि केवल यह दर्ज कर देना पर्याप्त नहीं है कि आरोपी जेल में है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है।
शीर्ष अदालत की आपत्ति क्या थी
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि दहेज हत्या जैसे गंभीर अपराध में जमानत देने के लिए ठोस कारणों का उल्लेख आवश्यक है। पीठ ने यह प्रश्न उठाया कि आदेश में बचाव पक्ष के तर्क दर्ज करने के अलावा स्वतंत्र न्यायिक विश्लेषण क्यों नहीं दिखाई देता। शीर्ष अदालत की इस सख्त टिप्पणी के बाद न्यायिक समुदाय में इस मामले को गंभीरता से देखा गया।
मौजूदा याचिका से सीधा संबंध नहीं
महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस जमानत याचिका से जस्टिस भाटिया ने स्वयं को अलग किया, उसका उस मामले से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि मौजूदा माहौल को देखते हुए उनके लिए जमानत मामलों की सुनवाई से दूरी बनाना बेहतर होगा। इसे न्यायिक शुचिता और निष्पक्षता के दृष्टिकोण से एक सतर्क कदम माना जा रहा है।
न्यायिक जवाबदेही पर उठे सवाल
इस घटनाक्रम ने न्यायिक जवाबदेही और निर्णयों की पारदर्शिता पर नई बहस छेड़ दी है। कानून विशेषज्ञों का मानना है कि उच्च न्यायालयों के आदेशों में स्पष्ट और विस्तृत तर्क देना आवश्यक है, खासकर तब जब मामला गंभीर आपराधिक आरोपों से जुड़ा हो। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि न्यायाधीशों पर सार्वजनिक टिप्पणियों का प्रभाव पड़ना असामान्य नहीं है, लेकिन संस्थागत संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
आगे की प्रक्रिया क्या होगी
अब संबंधित जमानत याचिका को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाएगा। मुख्य न्यायाधीश रोस्टर में आवश्यक बदलाव पर विचार कर सकते हैं। फिलहाल यह मामला न्यायिक प्रक्रियाओं की संवेदनशीलता और शीर्ष अदालत की निगरानी की भूमिका को एक बार फिर उजागर करता है।



