LegalAccess – न्याय तक पहुंच की कमी सबसे बड़ी चुनौती: सीजेआई सूर्यकांत
LegalAccess – भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने रविवार को कहा कि देश की न्यायिक व्यवस्था के सामने असली समस्या कानूनों की कमी नहीं, बल्कि आम लोगों की उन तक सीमित पहुंच है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक न्याय हर व्यक्ति तक समय पर और सहज तरीके से नहीं पहुंचेगा, तब तक मजबूत कानूनी ढांचे का पूरा लाभ समाज को नहीं मिल पाएगा।

अधिकार और पहुंच के बीच बढ़ती दूरी पर चिंता
उत्तराखंड में आयोजित एक क्षेत्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने बताया कि देश में अधिकारों और नीतियों का ढांचा मजबूत है, लेकिन उनका लाभ हर जरूरतमंद तक नहीं पहुंच पा रहा। दूरी, प्रक्रियाओं में देरी और क्रियान्वयन की कमजोरियों के कारण आम नागरिक अक्सर न्याय से दूर रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि इस अंतर को कम करना अब प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि व्यवस्था अधिक प्रभावी बन सके।
न्याय की समय पर उपलब्धता को बताया जरूरी
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अपने संबोधन में कहा कि केवल अधिकारों का अस्तित्व पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका समय पर मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की असली ताकत इस बात से मापी जानी चाहिए कि नागरिकों को वास्तविक रूप में न्याय कितना मिल पा रहा है। उनके अनुसार, अंतिम व्यक्ति तक न्याय पहुंचाना ही संस्थाओं की सफलता का असली पैमाना होना चाहिए।
पहाड़ी राज्यों की विशेष चुनौतियों का जिक्र
उन्होंने उत्तराखंड जैसे पहाड़ी क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए बताया कि भौगोलिक कठिनाइयों और सीमित संसाधनों के कारण न्याय तक पहुंच और भी जटिल हो जाती है। ऐसे इलाकों में स्थानीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था को अधिक लचीला और सुलभ बनाने की आवश्यकता है। उनका मानना है कि एक ही मॉडल पूरे देश पर लागू करने के बजाय क्षेत्रीय परिस्थितियों के अनुसार समाधान विकसित करना जरूरी है।
देशभर के अनुभवों से मिली समझ
प्रधान न्यायाधीश ने लद्दाख, श्रीनगर, नगालैंड और केरल सहित विभिन्न राज्यों में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि कई बार नागरिक अधिकारों की कमी से नहीं, बल्कि उन्हें हासिल करने के लिए उपयुक्त मंचों के अभाव के कारण संघर्ष करते हैं। उन्होंने कानूनी सहायता योजनाओं, जागरूकता कार्यक्रमों और बहु-सेवा शिविरों को इस समस्या के समाधान के रूप में महत्वपूर्ण बताया।
वैकल्पिक विवाद समाधान पर जोर
उन्होंने विवादों के निपटारे के लिए वैकल्पिक तरीकों को बढ़ावा देने की आवश्यकता भी जताई। मध्यस्थता, मुकदमे से पहले समझौता और लोक अदालत जैसे उपाय न केवल समय और खर्च बचाते हैं, बल्कि सामाजिक संबंधों को भी बनाए रखने में सहायक होते हैं। उनके अनुसार, इन उपायों को और अधिक व्यापक स्तर पर लागू करने की जरूरत है।
तकनीकी पहल और स्थानीय समाधान की सराहना
कार्यक्रम के दौरान उन्होंने उत्तराखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण की ‘न्याय मित्र’ पहल की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस तरह की डिजिटल और स्थानीय स्तर की पहलें खासतौर पर दूरदराज क्षेत्रों में न्याय तक पहुंच आसान बनाने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इससे लोगों को बिना अधिक परेशानी के सहायता मिल सकती है।
आम नागरिक तक न्याय पहुंचाना ही असली कसौटी
अपने संबोधन के अंत में न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा कि संविधान की सफलता बड़े मामलों से नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में न्याय की वास्तविक उपलब्धता से तय होती है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि संस्थाओं का मूल्यांकन इसी आधार पर होना चाहिए कि वे समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक कितनी प्रभावी तरीके से न्याय पहुंचा पा रही हैं।



