Maharashtra Political Reunion: महाराष्ट्र की सियासत में लिखा गया रिश्तों का नया अध्याय, मजबूरन एक हुए ठाकरे और पवार…
Maharashtra Political Reunion: महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों दो परिवारों के पुनर्मिलन की कहानियां हर तरफ छाई हुई हैं। पहले ठाकरे परिवार और अब पवार परिवार के बीच बढ़ती नजदीकियां इस बात का सबूत हैं कि राजनीति में कोई भी स्थायी दुश्मन नहीं होता। हालांकि, इन परिवारों के एकजुट होने के पीछे की वजहें भावनात्मक कम और (Strategic Alliance) के दांव-पेंच ज्यादा नजर आ रहे हैं। गिरता हुआ राजनीतिक वजूद और अस्तित्व पर मंडराते खतरों ने इन दिग्गजों को एक मंच पर आने के लिए मजबूर कर दिया है। राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे, शरद पवार और अजित पवार ने अलग-अलग रहकर अपनी ताकत आजमा ली, लेकिन चुनावी नतीजों ने उन्हें कड़वा सच दिखा दिया।

ठाकरे परिवार और सिमटता हुआ राजनीतिक साम्राज्य
ठाकरे परिवार की बात करें तो उनके लिए बीते कुछ साल अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लेकर आए हैं। राज ठाकरे के अलग होने के बाद भले ही उद्धव ठाकरे को तत्काल बड़ा नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन एकनाथ शिंदे के विद्रोह ने (Political Identity) के संकट को गहरा कर दिया। उद्धव को अपनी पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न तक खोना पड़ा, जिससे उनकी साख को भारी धक्का लगा। नतीजा यह हुआ कि जिस ठाकरे परिवार की कभी पूरे महाराष्ट्र में तूती बोलती थी, आज उनका प्रभाव मुख्य रूप से मुंबई के कुछ हिस्सों तक ही सिमट कर रह गया है।
राज ठाकरे की मनसे और उद्धव की सेना का संघर्ष
उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भी कोई खास कमाल नहीं दिखाया, वहीं राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की स्थिति और भी दयनीय रही। पिछले विधानसभा चुनाव में मनसे के अधिकांश उम्मीदवारों की (Election Results) के दौरान जमानत तक जब्त हो गई थी। इस विफलता ने दोनों भाइयों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर वे अलग-अलग चुनाव लड़ते रहे, तो महाराष्ट्र की राजनीति से उनका पत्ता पूरी तरह साफ हो सकता है। इसी डर ने करीब 20 साल के अंतराल के बाद दोनों भाइयों को फिर से साथ खड़ा कर दिया है।
पहली अग्निपरीक्षा में गठबंधन की करारी हार
उद्धव और राज ठाकरे का साथ आना सुनने में जितना प्रभावशाली लगा, धरातल पर उसकी शुरुआत उतनी ही निराशाजनक रही। साल 2025 में बेस्ट इंप्लॉयीज को-ऑपरेटिव क्रेडिट सोसायटी इलेक्शंस में इस गठबंधन की (Voter Sentiment) को लेकर कड़ी परीक्षा थी। लोगों को उम्मीद थी कि दोनों भाई मिलकर भारतीय जनता पार्टी को कड़ी टक्कर देंगे, लेकिन परिणाम इसके विपरीत रहे। इस चुनाव में ठाकरे बंधुओं का गठबंधन पूरी तरह विफल रहा और वे 21 सीटों में से एक भी सीट जीतने में कामयाब नहीं हो सके, जो उनके भविष्य के लिए एक खतरे की घंटी है।
निकाय चुनाव 2026 और ठाकरे बंधुओं का भविष्य
अब दोनों भाइयों की निगाहें 2026 में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों पर टिकी हैं। मुंबई, ठाणे और कल्याण जैसे महत्वपूर्ण नगर निगमों के (Local Body Elections) ठाकरे बंधुओं के लिए ‘करो या मरो’ की स्थिति पैदा करेंगे। उनके निशाने पर जहां मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की सेना होगी, वहीं वे भाजपा को भी पटखनी देने की कोशिश करेंगे। हालांकि, यह अभी भी स्पष्ट नहीं है कि इस गठबंधन में कांग्रेस और एनसीपी जैसे पुराने सहयोगी शामिल होंगे या नहीं, लेकिन इन चुनावों के नतीजे तय कर देंगे कि ठाकरे विरासत का भविष्य क्या होगा।
पवार परिवार का ड्रामा और अजित पवार की घर वापसी
पवार परिवार की कहानी भी ठाकरे परिवार से कुछ अलग नहीं है। चाचा शरद पवार से बगावत कर अलग राह चुनने वाले भतीजे अजित पवार ने सत्ता तो हासिल कर ली, लेकिन (Political Stability) के मोर्चे पर वह खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे। अजित को इस बात का भली-भांति अहसास हो गया है कि शरद पवार के बिना महाराष्ट्र की ग्रामीण राजनीति में अपनी जड़ें जमाए रखना नामुमकिन है। यही वजह है कि उन्होंने एक बार फिर अपने चाचा का हाथ थाम लिया है और दोनों परिवार फिर से एकजुट दिख रहे हैं।
पिंपरी-चिंचवाड़ चुनाव और चाचा-भतीजे का गठबंधन
15 जनवरी को होने वाले पिंपरी-चिंचवाड़ म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन चुनाव के लिए शरद पवार और अजित पवार ने फिर से साथ आने का फैसला किया है। यह वही अजित पवार हैं जिन्होंने दो साल पहले (Leadership Transition) का हवाला देते हुए अपने चाचा पर निजी हमले किए थे। उन्होंने शरद पवार की उम्र का जिक्र करते हुए उन्हें राजनीति से संन्यास लेने और युवाओं को रास्ता देने की सलाह दी थी। लेकिन अब सत्ता की बदलती हवा और पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष ने उन्हें वापस चाचा की शरण में जाने को मजबूर कर दिया है।
विकास और स्थिरता के दावों के बीच छिपी सत्ता की भूख
अजित पवार ने जब पाला बदला था, तब उन्होंने दावा किया था कि वह केवल महाराष्ट्र के विकास और स्थिरता के लिए भाजपा और शिंदे गुट के साथ गए हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि उनकी (Power Struggle) अब अंतिम दौर में है। उन्हें पता है कि शरद पवार की विरासत पर हक जताने के लिए परिवार का साथ होना जरूरी है। अब देखना यह होगा कि क्या पवार और ठाकरे परिवारों का यह बेमेल मेल महाराष्ट्र की जनता को रास आता है या फिर राज्य की राजनीति में कोई नया तीसरा विकल्प उभरकर सामने आएगा।



