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MiddleEastCrisis – ईरान संघर्ष के बीच जयशंकर ने ईरानी विदेश मंत्री से की बातचीत

MiddleEastCrisis – पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव के बीच भारत ने कूटनीतिक स्तर पर सक्रियता बढ़ा दी है। इसी क्रम में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से टेलीफोन पर बातचीत की। ईरान के विदेश मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी के अनुसार इस चर्चा में क्षेत्र की मौजूदा सुरक्षा स्थिति, समुद्री मार्गों की सुरक्षा और संघर्ष से जुड़े हालिया घटनाक्रमों पर विस्तार से विचार किया गया।

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यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान का सैन्य टकराव गंभीर रूप ले चुका है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े समुद्री मार्गों को लेकर भी चिंता बढ़ गई है।

होर्मुज जलडमरूमध्य और समुद्री सुरक्षा पर चर्चा

बातचीत के दौरान ईरान के विदेश मंत्री ने फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सुरक्षा का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उनके अनुसार हाल के घटनाक्रमों के कारण इस क्षेत्र में समुद्री यातायात के लिए अस्थिर स्थिति पैदा हो गई है।

ईरान का कहना है कि मौजूदा संकट अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों के कारण उत्पन्न हुआ है, जिसने पूरे क्षेत्र में तनाव को बढ़ा दिया है। तेहरान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अपील की है कि वह इस स्थिति के लिए जिम्मेदार पक्षों की जवाबदेही तय करे। ईरान ने अपने पारंपरिक रुख को दोहराते हुए कहा कि वह समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर अपनी नीति पर कायम है, लेकिन मौजूदा हालात क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चुनौती बने हुए हैं।

जयशंकर ने हालात पर जताई चिंता

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी इस बातचीत की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं के बीच पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और उससे जुड़े ताजा घटनाक्रमों पर विस्तृत चर्चा हुई। उन्होंने यह भी बताया कि दोनों पक्ष आगे भी संपर्क बनाए रखने पर सहमत हुए हैं।

ईरान में हाल ही में नेतृत्व परिवर्तन के बाद यह दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच पहली बातचीत थी। अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद उनके पुत्र मोजतबा खामेनेई को नया सर्वोच्च नेता घोषित किया गया है। यह निर्णय ऐसे समय आया जब अमेरिका और इजरायल के साथ सैन्य टकराव ने क्षेत्रीय राजनीति को और अधिक जटिल बना दिया है।

समुद्री मार्गों पर बढ़ा तनाव और ऊर्जा बाजार की चिंता

वर्तमान संघर्ष का असर केवल राजनीतिक या सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार ईरान ने फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास गतिविधियों को सीमित कर दिया है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है।

यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर होने वाले तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस के लगभग 20 प्रतिशत परिवहन इसी रास्ते से गुजरते हैं। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी तरह की बाधा का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि हाल ही में श्रीलंका के पास एक ईरानी युद्धपोत को डुबोए जाने की घटना का इस बातचीत में उल्लेख हुआ या नहीं। इस घटना ने भी क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाने का काम किया है।

अन्य देशों के साथ भी भारत का संपर्क

पश्चिम एशिया की स्थिति को देखते हुए भारत ने अन्य देशों के साथ भी कूटनीतिक संपर्क बनाए रखा है। विदेश मंत्री जयशंकर ने जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वाडेफुल और दक्षिण कोरिया के विदेश मंत्री चो ह्यून से भी चर्चा की। इन वार्ताओं में क्षेत्रीय संकट, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता से जुड़े मुद्दों पर विचारों का आदान-प्रदान किया गया।

भारत का मानना है कि मौजूदा संकट का समाधान संवाद और कूटनीति के माध्यम से ही संभव है। इसलिए नई दिल्ली लगातार विभिन्न देशों के साथ संपर्क में रहकर स्थिति पर नजर बनाए हुए है।

भारत के लिए आर्थिक और मानवीय चिंता

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का भारत पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है और कुल कच्चे तेल का लगभग 85 प्रतिशत विदेशों से आता है। ऐसे में समुद्री व्यापार मार्गों में बाधा या तेल की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बन सकती है।

इसके अलावा खाड़ी क्षेत्र में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक काम करते हैं। उनकी सुरक्षा और स्थिरता भारत सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है। नई दिल्ली ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों पर किसी भी प्रकार के हमले के खिलाफ है और क्षेत्र में शांति बहाल करने के लिए बातचीत को ही सबसे प्रभावी रास्ता मानती है।

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