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Supreme Court Verdict on SC ST Act: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सिर्फ गाली देना नहीं है गुनाह, जब तक जाति पर न हो वार…

Supreme Court Verdict on SC ST Act: देश की सर्वोच्च अदालत ने हाल ही में एक ऐतिहासिक व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल अपमानजनक भाषा का उपयोग करना एससी/एसटी अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने एक महत्वपूर्ण (Legal Interpretation of SC ST Act) फैसले में कहा कि जब तक अपशब्दों का प्रयोग किसी व्यक्ति को उसकी विशिष्ट जाति के कारण अपमानित करने के इरादे से न किया गया हो, तब तक इसे अत्याचार निवारण अधिनियम के दायरे में नहीं लाया जा सकता। अदालत का यह रुख उन मामलों में बेहद अहम है जहां आपसी विवाद को सीधे तौर पर इस कठोर कानून से जोड़ने की कोशिश की जाती है।

Supreme Court Verdict on SC ST Act
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पटना हाई कोर्ट के आदेश पर उठाए सवाल

यह पूरा मामला केशव महतो उर्फ केशव कुमार महतो द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने पटना उच्च न्यायालय के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसमें उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखने की अनुमति दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि (Criminal Proceedings Nullification) के संदर्भ में निचली अदालत और हाई कोर्ट दोनों ने मामले की गंभीरता को समझने में चूक की है। पीठ के अनुसार, न तो एफआईआर में और न ही पुलिस की चार्जशीट में कहीं भी यह उल्लेख था कि आरोपी ने जाति-आधारित कोई अपमानजनक टिप्पणी या धमकी दी थी, जिससे इस अधिनियम के प्रावधान लागू हों।

कानून की धारा 3 (1) की सटीक व्याख्या

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3 (1) के उन बिंदुओं को फिर से परिभाषित किया जो सजा का प्रावधान करते हैं। कानून कहता है कि कोई व्यक्ति जो इस समुदाय का सदस्य नहीं है, यदि वह (Intentional Insult in Public) के उद्देश्य से किसी सार्वजनिक स्थान पर किसी एससी/एसटी सदस्य को डराता है या अपमानित करता है, तभी वह दोषी माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है, न कि बिना ठोस आधार के किसी को कानूनी प्रक्रिया में उलझाना।

आंगनवाड़ी केंद्र विवाद और महतो की याचिका

अपीलकर्ता केशव कुमार महतो पर आरोप लगा था कि उन्होंने एक आंगनवाड़ी केंद्र में गाली-गलौज और मारपीट की थी, जिसके बाद उन पर एससी/एसटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। पटना हाई कोर्ट ने 15 फरवरी 2025 को महतो की (Judicial Review Petition) को खारिज कर दिया था, जिससे ट्रायल कोर्ट द्वारा जारी समन बरकरार रहा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर गहरी असहमति जताते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के बिना किसी भी व्यक्ति को इस विशेष कानून के तहत आरोपी बनाकर उसकी स्वतंत्रता को बाधित नहीं किया जा सकता।

सजा के लिए अनिवार्य दो शर्तें

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व के महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए यह साफ किया कि धारा 3(1)(आर) के तहत किसी को अपराधी ठहराने के लिए दो अनिवार्य शर्तों का पूरा होना जरूरी है। पहली शर्त यह कि शिकायतकर्ता वास्तव में अनुसूचित जाति या जनजाति से संबंध रखता हो और दूसरी सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह कि (Caste Based Harassment) का कृत्य केवल उसकी जाति के कारण ही किया गया हो। अगर विवाद का कारण निजी रंजिश या कोई अन्य तात्कालिक मुद्दा है, जिसमें जातिगत विद्वेष शामिल नहीं है, तो उसे अत्याचार की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा।

समुदाय का सदस्य होना मात्र सजा का आधार नहीं

पीठ ने अपने आदेश में यह स्पष्ट तौर पर दर्ज किया कि किसी शिकायतकर्ता का एससी या एसटी समुदाय से होना ही आरोपी को सजा दिलाने के लिए काफी नहीं है। जब तक यह साबित न हो जाए कि (Specific Intent to Humiliate) मौजूद था, तब तक अधिनियम के कठोर प्रावधान लागू नहीं होते। अदालत ने माना कि अपमान और धमकी को कानून की नजर में अपराध तभी माना जाएगा जब उसके पीछे समुदाय विशेष को नीचा दिखाने की मानसिकता हो। इसी आधार पर शीर्ष अदालत ने महतो के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।

न्यायपालिका का संतुलित दृष्टिकोण

इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने समाज में एक संतुलित संदेश भेजने का प्रयास किया है कि विशेष कानूनों का दुरुपयोग किसी भी निर्दोष के विरुद्ध नहीं होना चाहिए। अदालत ने (Fair Trial Standards) की महत्ता पर जोर देते हुए कहा कि कानूनी प्रावधानों को अक्षरशः लागू करना अनिवार्य है ताकि न्याय की मूल भावना सुरक्षित रहे। इस निर्णय से भविष्य में ऐसे मामलों में अदालतों को स्पष्टता मिलेगी जहां अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल तो हुआ है, लेकिन उसका आधार जातिगत भेदभाव नहीं है। यह फैसला उन लोगों के लिए एक बड़ी नजीर साबित होगा जो झूठी शिकायतों के कारण कानूनी पचड़ों में फंसे रहते हैं।

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