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UnclaimedFunds – सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस पैसों पर उठाए अहम सवाल

UnclaimedFunds – सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों और वित्तीय संस्थानों में पड़े लावारिस पैसों को लेकर केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक से जवाब तलब किया है। अदालत ने यह जानना चाहा कि मृत व्यक्तियों के निष्क्रिय खातों की जानकारी उनके कानूनी वारिसों तक पहुंचाने के लिए कोई प्रभावी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती। कोर्ट ने इस मुद्दे को गंभीर मानते हुए कहा कि पारदर्शिता जरूरी है, लेकिन इसके साथ ही धोखाधड़ी के खतरे को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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मामले की सुनवाई और कोर्ट की टिप्पणी

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत ने केंद्र सरकार और RBI को चार सप्ताह के भीतर नए हलफनामे दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही अगली सुनवाई की तारीख 5 मई तय की गई है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि इस तरह के डेटा को पूरी तरह सार्वजनिक किया गया, तो इसका गलत इस्तेमाल भी संभव है।

याचिका में क्या मांग रखी गई

यह याचिका एक केंद्रीकृत और खोज योग्य प्रणाली बनाने की मांग करती है, जिससे लोग अपने मृत रिश्तेदारों के बैंक खातों, बीमा पॉलिसी, शेयर और अन्य वित्तीय संपत्तियों में जमा धन का पता लगा सकें। याचिकाकर्ता का कहना है कि वर्तमान व्यवस्था में ऐसी जानकारी तक पहुंच आसान नहीं है, जिसके कारण बड़ी मात्रा में पैसा बिना दावे के पड़ा रह जाता है।

लावारिस रकम का आंकड़ा और मौजूदा व्यवस्था

सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि इस तरह की अनक्लेम्ड रकम को तीन प्रमुख फंड्स में ट्रांसफर किया जाता है, जिनमें डिपॉजिटर्स एजुकेशन एंड अवेयरनेस फंड, इन्वेस्टर एजुकेशन एंड प्रोटेक्शन फंड और सीनियर सिटीजन्स वेलफेयर फंड शामिल हैं। इन फंड्स में कुल मिलाकर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि जमा बताई गई है। यह आंकड़ा इस समस्या के व्यापक स्तर को दर्शाता है।

दावे की प्रक्रिया आसान बनाने का सुझाव

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी सुझाव दिया गया कि इन पैसों पर दावा करने की प्रक्रिया को सरल बनाया जाए। वर्तमान में कई मामलों में लंबी कानूनी प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिससे लोगों को कठिनाई होती है। इसके स्थान पर कुछ सरल औपचारिकताओं के जरिए वारिसों को उनका अधिकार दिलाने की बात कही गई।

धोखाधड़ी को लेकर कोर्ट की चिंता

अदालत ने इस प्रस्ताव पर सतर्कता जताते हुए कहा कि यदि बिना पर्याप्त जांच के दावों को स्वीकार किया गया, तो फर्जी दावेदारों की संख्या बढ़ सकती है। कोर्ट ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि इस तरह की स्थिति में अव्यवस्था पैदा हो सकती है, जहां कई लोग गलत तरीके से लाभ लेने की कोशिश करेंगे। इसलिए किसी भी नई व्यवस्था में सुरक्षा उपायों का मजबूत होना जरूरी है।

केंद्र सरकार और RBI का पक्ष

केंद्र सरकार की ओर से कहा गया कि यह विषय नीतिगत निर्णय से जुड़ा है और इसे सरकार के विवेक पर छोड़ा जाना चाहिए। वहीं RBI ने मौजूदा नियमों, जैसे केवाईसी और नॉमिनेशन प्रक्रिया को पर्याप्त बताया। उनका कहना है कि बैंक पहले से ही पहचान सत्यापन के आधार पर ही किसी भी राशि का भुगतान करते हैं और बिना उचित जांच के पैसे जारी नहीं किए जा सकते।

आगे की दिशा पर नजर

अदालत ने यह स्पष्ट किया है कि अंतिम निर्णय लेने से पहले केंद्र और RBI के विस्तृत जवाबों का इंतजार किया जाएगा। इस मामले को लेकर यह भी सामने आया कि पहले एक केंद्रीकृत डेटाबेस बनाने की योजना पर चर्चा हुई थी, लेकिन अब तक इसे लागू नहीं किया गया है। ऐसे में अब सभी की नजर आगामी सुनवाई पर टिकी है, जहां इस मुद्दे पर आगे की दिशा तय हो सकती है।

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