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West Bengal Assembly Elections: ममता के गढ़ में हुआ तीसरी शक्ति का उदय, क्या हुमायूं कबीर बिगाड़ेंगे तृणमूल का खेल…

West Bengal Assembly Elections: पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है क्योंकि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हो गई हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए यह चुनाव अपनी सत्ता और साख बचाने की एक बड़ी (political challenge) के रूप में सामने आया है। जहां तृणमूल कांग्रेस अपनी जमीन मजबूत बनाए रखने की कोशिश कर रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी पहली बार कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग पर भगवा लहराने का सपना संजोए बैठी है। दोनों दलों के बीच का यह टकराव अब और भी दिलचस्प होता जा रहा है।

West Bengal Assembly Elections
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हुमायूं कबीर के बगावती सुरों ने बढ़ाई ममता की टेंशन

तृणमूल कांग्रेस के भीतर से उठी बगावत की आवाज ने पार्टी आलाकमान की रातों की नींद उड़ा दी है। बागी विधायक हुमायूं कबीर ने जिस तरह से ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोला है, उससे राज्य का (electoral equation) पूरी तरह बदलता नजर आ रहा है। कबीर अब केवल एक बागी विधायक नहीं रह गए हैं, बल्कि उन्होंने राज्य में एक नई राजनीतिक धुरी बनाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं, जो सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा सकती है।

ओवैसी और पीरजादा के साथ बन रहा नया गठजोड़

राजनीति के गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा हुमायूं कबीर की असदुद्दीन ओवैसी और पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के साथ बढ़ती नजदीकियों की हो रही है। यदि एआईएमआईएम प्रमुख और आईएसएफ के मुखिया के साथ कबीर का (strategic alliance) सफल रहता है, तो बंगाल में एक मजबूत मुस्लिम नेतृत्व वाला मोर्चा उभर सकता है। बिहार चुनाव में ओवैसी की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि मुस्लिम मतदाता अब क्षेत्रीय क्षत्रपों के बजाय नए विकल्पों पर विचार करने के लिए तैयार हैं।

मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण और तृणमूल की चिंता

पश्चिम बंगाल में लगभग 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो पारंपरिक रूप से ममता बनर्जी की जीत में बड़ी भूमिका निभाती रही है। अगर हुमायूं कबीर और उनके नए सहयोगी इस (vote bank) का थोड़ा भी ध्रुवीकरण करने में सफल रहते हैं, तो इसका सीधा नुकसान तृणमूल कांग्रेस को उठाना पड़ेगा। वोटों का यह बिखराव ममता बनर्जी के लिए सत्ता की राह को बेहद कठिन बना सकता है, क्योंकि मुस्लिम बहुल सीटों पर जीत का अंतर अक्सर बहुत कम रहता है।

भाजपा की बूथ प्रबंधन रणनीति और आक्रामक रुख

दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी ने पिछले चुनावों की गलतियों से सीख लेते हुए अपनी रणनीति में बड़े बदलाव किए हैं। भाजपा इस बार केवल रैलियों पर निर्भर नहीं है, बल्कि उसने अपने (booth management) को अभूतपूर्व तरीके से मजबूत किया है। पार्टी का मानना है कि अगर वे जमीनी स्तर पर मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक लाने में सफल रहे, तो सत्ता विरोधी लहर का फायदा उठाकर वे बंगाल में ऐतिहासिक जीत दर्ज कर सकते हैं। भाजपा के विधायक और कार्यकर्ता इस बार पहले से कहीं ज्यादा सक्रिय नजर आ रहे हैं।

हाशिए पर जाते वामपंथ और कांग्रेस का भविष्य

एक दौर था जब पश्चिम बंगाल में माकपा और कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था, लेकिन आज ये पार्टियां राज्य की राजनीति में लगभग अप्रासंगिक हो चुकी हैं। इन दलों के (political marginalization) ने बंगाल के मुकाबले को द्विध्रुवीय बना दिया था, लेकिन अब हुमायूं कबीर के उभरने से यहां त्रिकोणीय संघर्ष के आसार बन रहे हैं। पुरानी पार्टियों के कमजोर होने का सबसे बड़ा फायदा भाजपा को मिला है, जिसने विपक्ष के खाली स्थान को पूरी तरह भर दिया है।

ध्रुवीकरण की राजनीति और भाजपा को मिलने वाला संभावित लाभ

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि मुस्लिम वोटों में बंटवारा होता है, तो इसका अप्रत्यक्ष लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा। वोटों के विभाजन से हिंदू मतों का (polarization effects) और भी स्पष्ट हो जाएगा, जो भाजपा के पक्ष में जा सकता है। ममता बनर्जी इस खतरे को बखूबी समझती हैं, यही कारण है कि वे लगातार अल्पसंख्यकों को एकजुट रहने और बाहरी ताकतों से सावधान रहने की अपील कर रही हैं।

क्या हुमायूं कबीर बनेंगे बंगाल के किंगमेकर?

हुमायूं कबीर भले ही वर्तमान में एक निश्चित क्षेत्र तक सीमित दिखाई दे रहे हों, लेकिन उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं काफी बड़ी हैं। वे खुद को बंगाल में (third force) के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। अगर वे ओवैसी और सिद्दीकी के साथ मिलकर एक प्रभावशाली गठबंधन बनाने में सफल रहे, तो वे विधानसभा चुनाव के बाद किंगमेकर की भूमिका में भी नजर आ सकते हैं। उनकी हर गतिविधि पर भाजपा और तृणमूल दोनों की पैनी नजर बनी हुई है।

भविष्य की राजनीति और सत्ता का संग्राम

जैसे-जैसे चुनाव की तारीखें करीब आएंगी, बंगाल का सियासी पारा और अधिक चढ़ना तय है। केंद्रीय नेतृत्व के आक्रामक रुख और स्थानीय स्तर पर बदलते (leadership dynamics) ने इस चुनाव को देश का सबसे महत्वपूर्ण मुकाबला बना दिया है। ममता बनर्जी की प्रशासनिक साख और भाजपा की सांगठनिक शक्ति के बीच अब हुमायूं कबीर जैसा ‘एक्स फैक्टर’ क्या रंग लाता है, यह देखना दिलचस्प होगा। बंगाल की जनता का फैसला इस बार राज्य की दिशा और दशा दोनों बदल सकता है।

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