AK-203 – कानपुर में पूरी तरह स्वदेशी बनी, सेना के ट्रायल फरवरी से शुरू
AK-203 – कानपुर की स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री में तैयार हो रही अत्याधुनिक असॉल्ट राइफल एके-203 ने स्वदेशीकरण का निर्णायक पड़ाव पार कर लिया है। लंबे समय तक रूस के साथ तकनीकी साझेदारी में बनी यह राइफल अब पूरी तरह भारतीय कलपुर्जों और तकनीक पर आधारित हो चुकी है। रक्षा क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, सेना को सौंपे जाने से पहले इस हथियार को तीन अलग-अलग भौगोलिक और मौसमीय परिस्थितियों में परखा जाएगा। पहला परीक्षण इस महीने हिमाचल प्रदेश के सुमडो में ठंडे मौसम में किया जाएगा, जिसमें सेना, कानपुर की एसएएफ और अमेठी स्थित ऑर्डिनेंस फैक्ट्री प्रोजेक्ट कोरवा के विशेषज्ञ संयुक्त रूप से शामिल होंगे।

चरणबद्ध स्वदेशीकरण की लंबी यात्रा
एके-203 के निर्माण की शुरुआत भारत-रूस संयुक्त उपक्रम आईआरआरपीएल के तहत हुई थी, लेकिन इसे पूरी तरह देश में विकसित करने के लिए चरणबद्ध रणनीति अपनाई गई। जुलाई 2024 में जब एसएएफ में उत्पादन शुरू हुआ, तब इसके 85 प्रतिशत हिस्से रूस से आते थे और केवल 15 प्रतिशत भारत में बनते थे। बाद के चरणों में विदेशी निर्भरता धीरे-धीरे घटाई गई—पहले 70 प्रतिशत, फिर 30 प्रतिशत—और समानांतर रूप से भारत में बनने वाले पुर्जों का अनुपात बढ़ाया गया। अब स्थिति यह है कि राइफल के सभी प्रमुख घटक देश के भीतर निर्मित हो रहे हैं, जिसे रक्षा मंत्रालय आत्मनिर्भरता की बड़ी उपलब्धि मान रहा है।
कहां बनते हैं इसके हिस्से
इस परियोजना का केंद्र कानपुर स्थित एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड की स्मॉल आर्म्स फैक्ट्री है, जहां राइफल के अधिकांश महत्वपूर्ण पुर्जे तैयार किए जाते हैं। कुछ विशेष कलपुर्जे कोलकाता की ईशापुर राइफल फैक्ट्री में बनाए जाते हैं, जबकि अंतिम असेंबलिंग अमेठी के कोरवा संयंत्र में होती है। इस तरह का वितरित उत्पादन मॉडल न केवल तकनीकी क्षमता बढ़ाता है, बल्कि देश के अलग-अलग रक्षा कारखानों को भी मजबूत करता है।
तीन मौसमों में कठोर परीक्षण
विंटर ट्रायल के बाद एके-203 को भीषण गर्मी में राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में परखा जाएगा, ताकि उच्च तापमान में इसकी विश्वसनीयता जाँची जा सके। इसके बाद दक्षिण भारत में बारिश और नमी वाले हालात में परीक्षण होगा। रक्षा अधिकारियों का कहना है कि इन तीनों चरणों के सफल समापन के बाद ही राइफल को बड़े पैमाने पर सेना में शामिल किया जाएगा।
सेना की तैनाती की योजना
भारतीय सेना अपने मानक हथियार के रूप में एके-203 को अपनाने की प्रक्रिया में है। पहले चरण में पाँच लाख से अधिक राइफलों की आपूर्ति का लक्ष्य रखा गया है, जिनमें से कुछ पहले ही सैनिकों को मिल चुकी हैं। आने वाले वर्षों में सभी नई आपूर्ति पूरी तरह स्वदेशी संस्करण की होगी। वर्तमान में इस्तेमाल हो रही इंसास राइफल को धीरे-धीरे चरणबद्ध तरीके से बदला जाएगा, ताकि अगले सात वर्षों में अधिकांश सैनिक एके-203 से लैस हों।
नेतृत्व का दृष्टिकोण
एसएएफ के महाप्रबंधक सुरेंद्रपति ने इसे “आत्मनिर्भर भारत” अभियान की ठोस सफलता बताते हुए कहा कि स्वदेशीकरण सिर्फ नारा नहीं, बल्कि जमीन पर दिखने वाला बदलाव है। उनके अनुसार, स्वदेशी उत्पादन से न केवल आयात निर्भरता घटेगी, बल्कि रखरखाव, स्पेयर पार्ट्स और भविष्य के उन्नयन में भी आसानी होगी।
इंसास से एके-203 तक बदलाव क्यों जरूरी
सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक युद्ध और सीमा सुरक्षा की बदलती जरूरतों के कारण पुराने हथियारों को नए प्लेटफॉर्म से बदलना अनिवार्य हो गया है। एके-203 की बेहतर सटीकता, स्थिरता और विश्वसनीयता इसे मौजूदा इंसास से अधिक प्रभावी बनाती है।
तकनीकी खूबियां और क्षमता
यह राइफल फोल्डिंग और एडजस्टेबल बटस्टॉक से लैस है, जिससे अलग-अलग परिस्थितियों में इसका उपयोग आसान होता है। इसमें नाटो मानक का 7.62 मिमी कारतूस इस्तेमाल होता है और 30 राउंड की मैगजीन के साथ यह एक मिनट में लगभग 600 राउंड तक फायर कर सकती है। लगभग 400 मीटर की दूरी तक इसकी प्रभावी मारक क्षमता मानी जाती है। पिकेटिनी रेल और नाइट विजन सिस्टम की सुविधा इसे रात में भी उपयोगी बनाती है।
मैदान में उपयोगिता और सैनिकों की प्रतिक्रिया
फील्ड ट्रायल में शामिल कुछ सैनिकों ने बताया कि नई राइफल का संतुलन बेहतर है और लगातार फायरिंग के बावजूद इसकी स्थिरता बनी रहती है। 3.8 किलो वजन और मोड़े जाने पर 690 मिमी लंबाई इसे गश्त और शहरी अभियानों के लिए व्यावहारिक बनाती है।
घरेलू रक्षा उद्योग पर प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि एके-203 का पूर्ण स्वदेशीकरण भारत के रक्षा विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को दीर्घकालिक मजबूती देगा। इससे न केवल रोजगार सृजन होगा, बल्कि भविष्य में अन्य उन्नत हथियार प्रणालियों के विकास का रास्ता भी खुलेगा।



