Gonda Cooperative Bank Scam: 21 करोड़ के बैंक घोटाले में गिरेगी गाज, रिश्वत ने खाकी को किया शर्मसार
Gonda Cooperative Bank Scam: उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले में स्थित कोऑपरेटिव बैंक की शाखा में हुए 21 करोड़ रुपये के विशालकाय घोटाले ने वित्तीय संस्थाओं की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में शासन ने बेहद सख्त रुख अख्तियार करते हुए मुख्य प्रबंधक सहित चार कर्मचारियों को पद से हटाने की तैयारी पूरी कर ली है। विभाग के भीतर मचे इस (Financial Integrity) के संकट को देखते हुए दो सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच टीम का गठन किया गया है, जो घोटाले की तह तक जाकर दोषियों की जवाबदेही तय करेगी।

संपत्तियों की कुर्की और वसूली का एक्शन प्लान
घोटाले की राशि इतनी बड़ी है कि इसकी भरपाई के लिए अब आरोपियों की निजी संपत्तियों पर प्रशासन की नजर है। विभागीय सूत्रों के अनुसार, आरोपियों से गबन की गई रकम की रिकवरी सुनिश्चित करने के लिए उनकी चल और अचल संपत्तियों की कुर्की करने की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इस पूरी (Asset Recovery) प्रक्रिया की निगरानी के लिए लखनऊ मंडल के संयुक्त आयुक्त रत्नाकर सिंह को विशेष रूप से नामित किया गया है, ताकि एक-एक पैसे का हिसाब लिया जा सके।
एक लाख की घूस ने दबोचा मटेरा थानाध्यक्ष को
भ्रष्टाचार की एक और शर्मनाक तस्वीर बहराइच के मटेरा थाने से सामने आई है, जहां कानून के रखवालों ने ही कानून का सौदा कर डाला। एक संगीन मामले के आरोपी को महज एक लाख रुपये की रिश्वत लेकर थाने से ही छोड़ देने के आरोप में थानाध्यक्ष, एक दरोगा और सिपाही को सस्पेंड कर दिया गया है। इस (Police Accountability) के उल्लंघन की खबर फैलते ही महकमे में हड़कंप मच गया है और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लग गए हैं।
हेल्पलाइन नंबर ने खोला भ्रष्टाचार का कच्चा चिट्ठा
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलते हुए आईजी देवीपाटन मंडल अमित पाठक ने हाल ही में एक एंटी-करप्शन हेल्पलाइन नंबर जारी किया था। इसी नंबर पर मिली एक गुप्त शिकायत ने पुलिसकर्मियों के काले कारनामों का पर्दाफाश कर दिया। जब हेल्पलाइन पर (Corruption Investigation) शुरू हुई, तो पता चला कि मटेरा पुलिस ने अपहरण जैसे गंभीर मामले के आरोपी से सांठगांठ की थी। जनता का सीधा संवाद ही इस कार्रवाई की मुख्य वजह बना है।
कोलकाता की लड़की और अपहरण का पेचीदा मामला
मामले की जड़ें पश्चिम बंगाल से जुड़ी हुई हैं, जहां की एक लड़की का अपहरण कर उसे बहराइच के मटेरा थाना क्षेत्र में छिपाकर रखा गया था। पश्चिम बंगाल की पुलिस जब स्थानीय पुलिस की मदद से दबिश देने पहुंची, तो आरोपियों को हिरासत में लिया गया था। हालांकि, ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने अपनी (Professional Ethics) को ताक पर रखकर आरोपियों से सौदेबाजी शुरू कर दी। मुनीजर सिंह नाम के शख्स को पैसे के बदले छोड़ना पुलिस की सबसे बड़ी गलती साबित हुई।
आईजी की गोपनीय जांच में खुले राज
जब भ्रष्टाचार विरोधी सेल को इस घूसखोरी की भनक लगी, तो आईजी अमित पाठक ने तत्काल एक गोपनीय जांच टीम गठित की। जांच के शुरुआती चरणों में ही यह स्पष्ट हो गया कि थानाध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार बौद्ध, दरोगा विशाल जायसवाल और आरक्षी अवधेश यादव ने अवैध रूप से धन उगाही की है। इस (Internal Affairs Enquiry) की रिपोर्ट आने के बाद आईजी ने बिना देर किए तीनों पुलिसकर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया और उनके खिलाफ विभागीय जांच के कड़े निर्देश दिए।
जीरो टॉलरेंस की नीति से अपराधियों में खौफ
देवीपाटन मंडल में भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़ी यह जंग अब निर्णायक मोड़ पर है। पुलिस महानिरीक्षक का स्पष्ट संदेश है कि वर्दी की आड़ में किसी भी प्रकार की अनैतिक गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बैंक घोटाले से लेकर पुलिस रिश्वतखोरी तक, शासन का यह कड़ा (Administrative Action) यह दर्शाता है कि अब सरकारी कुर्सी पर बैठकर भ्रष्टाचार करना सुरक्षित नहीं रह गया है। दोषियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के साथ-साथ कठोरतम सजा दिलाने की तैयारी है।
जनता का बढ़ता विश्वास और पारदर्शिता की ओर कदम
इन दोनों ही घटनाओं ने एक तरफ जहां सिस्टम की खामियों को उजागर किया है, वहीं दूसरी तरफ त्वरित कार्रवाई ने प्रशासन पर जनता का भरोसा भी बढ़ाया है। बैंक घोटाले में (Public Sector Governance) को बेहतर बनाने और पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए ऐसी कार्रवाइयां नजीर पेश करती हैं। सरकार की मंशा साफ है कि चाहे बैंक का बड़ा अधिकारी हो या थाने का दरोगा, कानून से ऊपर कोई नहीं है और हर घोटाले का अंत जेल की सलाखों के पीछे ही होगा।



