Tragic Fire Accident in UP: भवानीपुरा की चीख ने इंसानियत को रुला दिया, एक बेबस मां, अंधी मासूम और आग का वो तांडव…
Tragic Fire Accident in UP: आगरा-कानपुर नेशनल हाईवे के किनारे बसा शांत सा गांव भवानीपुरा बुधवार की सुबह एक ऐसी चीख का गवाह बना, जिसे सुनकर पत्थर दिल भी पसीज जाए। कुदरत ने दो साल की मासूम शान्या को पहले ही रोशनी से महरूम रखा था, लेकिन किसे पता था कि काल की नजर भी उसी पर होगी। जब घर के (Short Circuit Fire Hazard) ने देखते ही देखते पूरे कमरे को अपनी आगोश में ले लिया, तब उस मासूम को भागने का रास्ता तक नहीं मिला। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं है, बल्कि एक हंसते-खेलते परिवार की उम्मीदों का जलकर राख हो जाना है।

मां छत पर काम करती रही और नीचे काल मंडराता रहा
सुबह का वक्त था, शान्या के पिता आदित्य रोज की तरह अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए औरैया स्थित एक गैस एजेंसी पर जा चुके थे। घर में शान्या और उसकी मां अंशू ही थे। मां अपनी गृहस्थी की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए छत पर उपले बना रही थी। इसी बीच नीचे वाले कमरे में, जहां (Child Safety in Households) सबसे महत्वपूर्ण होती है, वहां बिजली के तारों से चिंगारी उठी। अंशू को इस बात का रत्ती भर भी अहसास नहीं था कि जिस कमरे में उसकी लाडली सो रही है, वह कुछ ही पलों में आग का दरिया बन जाएगा।
जन्म से नेत्रहीन बेटी की बेबसी और वो खौफनाक मंजर
शान्या महज दो साल की थी और जन्म से ही नेत्रहीन होने के कारण बाहरी दुनिया से पूरी तरह अनजान थी। वह न तो देख सकती थी और न ही ठीक से चल-फिर पाती थी। जब कमरे में (Electrical Safety Awareness) की कमी या तकनीकी खराबी के कारण आग भड़की, तो वह मासूम बिस्तर पर ही असहाय पड़ी रही। लपटों ने जब बिस्तर को घेरा होगा, तो उस बच्ची ने अपनी बेबसी में कितना दर्द सहा होगा, यह सोचकर ही रूह कांप जाती है। वह खुद को बचाना तो दूर, शायद अपनी मां को ठीक से पुकार भी नहीं पाई।
धुएं का गुबार और एक मां की बेतहाशा दौड़
काफी देर बाद जब छत पर काम कर रही अंशू की नजर नीचे से उठते काले धुएं पर पड़ी, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह बदहवास होकर नीचे की ओर दौड़ी, लेकिन तब तक (Emergency Fire Response) की सारी सीमाएं टूट चुकी थीं। कमरे के जंगले से लेकर बिस्तर और तिरपाल तक सब कुछ धू-धू कर जल रहा था। अपनी आंखों के तारे को आग की लपटों के बीच घिरा देख मां की जो चीख निकली, उसने पूरे गांव के सन्नाटे को चीर दिया। ग्रामीण दौड़े, पानी डाला, संघर्ष किया, पर नियति अपना काम कर चुकी थी।
जमा-पूंजी के साथ जल गई माता-पिता की इकलौती उम्मीद
आदित्य और अंशू की साढ़े तीन साल पहले शादी हुई थी और शान्या उनकी इकलौती संतान थी। बेटी के दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने कभी उसे खुद पर बोझ नहीं समझा, बल्कि वे (Disabled Child Care) को अपनी प्राथमिकता मानते हुए उसका इलाज करा रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि एक दिन उनकी बेटी की आंखों में भी रोशनी आएगी। लेकिन इस आग ने न केवल उनकी बेटी को छीना, बल्कि कमरे में रखे बेड, टीवी, कपड़े और मेहनत से जोड़े गए 60 हजार रुपये नकद भी राख के ढेर में बदल दिए।
जर्जर वायरिंग और मौत का सामान बनी एलईडी रॉड
प्रारंभिक जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले और डराने वाले हैं। कमरे के जंगले के पास लगी एक एलईडी रॉड के तारों में शॉर्ट सर्किट हुआ था। वहां रखी सरिया पर लिपटी पॉलीथिन ने उस छोटी सी चिंगारी को (Fire Prevention Measures) के अभाव में बड़ी आग में तब्दील कर दिया। थाना प्रभारी विपिन मलिक ने भी पुष्टि की है कि बिजली की अव्यवस्थित वायरिंग ही इस पूरी त्रासदी की मुख्य वजह बनी। एक छोटी सी लापरवाही ने एक हंसते-खेलते घर को मातम के सन्नाटे में बदल दिया।
गांव में मातम और बदहवास दादा-दादी का विलाप
घटना की खबर जैसे ही महेवा में रहने वाले शान्या के दादा-दादी को मिली, वे सुध-बुध खोकर भवानीपुरा पहुंचे। अपनी पोती का निष्प्राण और जला हुआ शरीर देख उनका विलाप रुकने का नाम नहीं ले रहा था। पूरा गांव इस समय (Emotional Support for Victims) के लिए आदित्य के घर पर जमा है। हर आंख नम है और हर कोई यही कह रहा है कि उस मासूम की क्या खता थी, जिसे कुदरत ने पहले रोशनी नहीं दी और फिर इतनी दर्दनाक मौत दे दी।
प्रशासन का आश्वासन और सुरक्षा के सवाल
हादसे के बाद तहसीलदार भरथना दिलीप कुमार और लेखपाल राहुल गोयल ने मौके का मुआयना किया। प्रशासन ने पीड़ित परिवार को (Government Compensation and Relief) के तहत हर संभव मदद का भरोसा दिलाया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी मुआवजा उस मां की गोद को फिर से भर पाएगा? यह घटना हमें चेतावनी देती है कि हम अपने घरों में बिजली के उपकरणों और वायरिंग की समय-समय पर जांच जरूर कराएं, ताकि फिर किसी मासूम को ऐसी अग्निपरीक्षा न देनी पड़े



