Unnao Rape Case Legal Battle: उन्नाव कांड में कुलदीप सेंगर की रिहाई के बाद पीड़िता का छलका दर्द, सिसकती आवाज में कही ये बात
Unnao Rape Case Legal Battle: उत्तर प्रदेश के चर्चित उन्नाव दुष्कर्म कांड में दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले ने एक बार फिर पुराने जख्मों को हरा कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को अदालत से जमानत मिलने के बाद पीड़िता और उसका परिवार गहरे खौफ के साये में जीने को मजबूर है। यह केवल एक अदालती फैसला नहीं है, बल्कि उस (Victim Trauma and Recovery) की कहानी है जो सालों से न्याय की आस में अपनी जान हथेली पर रखकर लड़ रही है। पीड़िता की कांपती आवाज और बहते आंसू यह बताने के लिए काफी हैं कि सलाखों के बाहर आता अपराधी उसके लिए किसी काल से कम नहीं है।

कल घर छिन जाएगा और फिर मार दिया जाएगा
फैसले के बाद पीड़िता ने मीडिया से बातचीत करते हुए अपनी सुरक्षा को लेकर गंभीर आशंकाएं जताई हैं। सिसकते हुए उसने कहा कि आज अपराधी को जमानत मिली है, कल उसका आशियाना छीन लिया जाएगा और फिर उसे मौत के घाट उतार दिया जाएगा। जब कोर्ट में फैसला सुनाया जा रहा था, तब वह अपनी मां के साथ वहीं मौजूद थी, लेकिन उसकी (Judicial Representation Concerns) और आपत्तियों को अनसुना कर दिया गया। खौफ का आलम यह है कि वह खुदकुशी के बारे में सोचती है, लेकिन अपने छोटे बच्चों का चेहरा देखकर हिम्मत नहीं जुटा पाती।
सुरक्षा कवच हटने से बढ़ा जान का खतरा
पीड़िता ने बताया कि उसकी सुरक्षा को लेकर वह शुरू से ही आशंकित थी। पहले परिवार, गवाहों और पैरोकारों की सुरक्षा को कम किया गया और अब मुख्य आरोपी को जमानत मिलना उसके ताबूत में आखिरी कील जैसा है। फिलहाल वह दिल्ली में (Police Protection Challenges) के साथ अपने पति और दो छोटे बच्चों के साथ रह रही है। उसका मानना है कि सेंगर के बाहर आने के बाद उसका खुले में रहना नामुमकिन हो जाएगा। स्थिति इतनी गंभीर है कि वह अब जेल के भीतर शरण लेने की बात कर रही है, क्योंकि बाहर वह खुद को असुरक्षित मानती है।
मार्च में ही सीआरपीएफ सुरक्षा हटाने का हुआ था निर्णय
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर पीड़िता और उसके करीबियों को सीआरपीएफ की कड़ी सुरक्षा प्रदान की गई थी। हालांकि, इसी साल मार्च में केंद्र सरकार की दलीलों के बाद इसे हटाने का फैसला आया। सरकार का तर्क था कि चूंकि मुख्य आरोपी पर (Criminal Conviction Details) सिद्ध हो चुका है और ट्रायल पूरा हो गया है, इसलिए अब विशेष सुरक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर सुरक्षा हटाई गई, जिसने पीड़िता को पूरी तरह से असहाय और कमजोर स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है।
इंडिया गेट पर न्याय की गूंज और पुलिस की सख्ती
हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ दिल्ली की सड़कों पर भी आक्रोश देखा गया। महिला अधिकार कार्यकर्ता योगिता भयाना ने पीड़िता के समर्थन में इंडिया गेट पर धरना देने का प्रयास किया। हालांकि, कानून व्यवस्था का हवाला देते हुए पुलिस ने उन्हें (Civil Rights Activism) करने से जबरन रोक दिया। प्रदर्शनकारियों को धरना स्थल से हटाकर हिरासत में लिया गया और बाद में छोड़ दिया गया, लेकिन इस घटना ने स्पष्ट कर दिया कि न्याय की इस लड़ाई में पीड़िता अब भी खुद को अकेला महसूस कर रही है।
प्रधानी की चुनावी रंजिश और तबाह होता परिवार
उन्नाव के माखी गांव में शुरू हुई यह जंग असल में साल 2002 की राजनीतिक रंजिश का परिणाम है। कुलदीप सेंगर और पीड़िता के परिवार के बीच प्रधानी के चुनाव को लेकर (Local Political Rivalry) शुरू हुई थी, जिसने देखते ही देखते एक हंसते-खेलते परिवार को कब्रिस्तान में बदल दिया। पीड़िता के ताऊ की बेरहमी से हत्या कर दी गई और उसके चाचा को सालों तक फरार रहना पड़ा। सत्ता के रसूख और पुरानी दुश्मनी ने इस मामले को एक साधारण विवाद से बदलकर राज्य के सबसे बड़े आपराधिक कांड में तब्दील कर दिया।
रंजिश का वो मोड़ जिसने चार अपनों की जान ली
4 जून 2017 को जब पीड़िता ने दुष्कर्म का आरोप लगाया, तब से मौत का तांडव और तेज हो गया। उसके पिता की पुलिस हिरासत में बेरहमी से पिटाई के बाद मौत हो गई, जबकि एक सड़क हादसे में उसकी चाची और मौसी की जान चली गई। वह चाची जो इस मामले में (CBI Investigation Process) की मुख्य गवाह थीं, उनकी मौत ने केस की दिशा बदलने की कोशिश की। रसूखदार विधायक के खिलाफ खड़े होने की कीमत इस परिवार ने अपने चार सदस्यों की जान देकर चुकाई है, और आज भी रिश्तेदारों ने डर के मारे उनसे दूरी बना रखी है।
खाकी के दाग और सीबीआई की बड़ी कार्रवाई
इस मामले में केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि पुलिस प्रशासन के कई अधिकारी भी कटघरे में रहे। सीबीआई ने 2018 में माखी के तत्कालीन थानेदार और दरोगा को गिरफ्तार किया था, जिन पर (Law Enforcement Accountability) के उल्लंघन और आरोपी की मदद करने के गंभीर आरोप थे। एसआईटी की जांच में भी कई पुलिसकर्मियों को दोषी पाया गया और उन्हें निलंबित किया गया। यह दर्शाता है कि अपराधी को बचाने के लिए सिस्टम में कितनी गहरी पैठ बनाई गई थी, जिसे तोड़ने के लिए पीड़िता ने एक दशक लंबी लड़ाई लड़ी है।



