GreenCorridor – कंडी मार्ग निर्माण को नई उम्मीद, ग्रीन कॉरिडोर से रास्ता साफ
GreenCorridor – देहरादून-दिल्ली एक्सप्रेस-वे पर बने 12 किलोमीटर लंबे ग्रीन कॉरिडोर के शुरू होने के बाद उत्तराखंड में एक पुराने और महत्वपूर्ण सड़क प्रोजेक्ट को लेकर नई उम्मीदें जगी हैं। यह प्रोजेक्ट गढ़वाल और कुमाऊं को जोड़ने वाले कंडी मार्ग से जुड़ा है, जो लंबे समय से अटका हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि जिस तकनीक से ग्रीन कॉरिडोर तैयार किया गया है, उसी मॉडल को अपनाकर कंडी मार्ग का रास्ता भी निकाला जा सकता है।

वन्यजीव क्षेत्र बना सबसे बड़ी बाधा
कंडी मार्ग का सबसे जटिल हिस्सा कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के बीच से गुजरने वाला इलाका है, जो करीब 40 किलोमीटर लंबा है। यह क्षेत्र बाघ और हाथियों के लिए महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग माना जाता है। इसी वजह से यहां सड़क निर्माण को लेकर बार-बार आपत्तियां उठती रही हैं और अब तक परियोजना को मंजूरी नहीं मिल सकी। वन्यजीव संरक्षण को ध्यान में रखते हुए इस क्षेत्र में किसी भी निर्माण कार्य को बेहद संवेदनशील माना जाता है।
एलिवेटेड रोड बन सकता है समाधान
विशेषज्ञों का सुझाव है कि मोरघट्टी और झिरना जैसे संवेदनशील इलाकों में एलिवेटेड रोड या ग्रीन कॉरिडोर का निर्माण इस समस्या का व्यावहारिक समाधान हो सकता है। इससे वन्यजीवों के प्राकृतिक मार्ग में बाधा नहीं आएगी और सड़क निर्माण भी संभव हो सकेगा। देहरादून-दिल्ली एक्सप्रेस-वे पर बने ग्रीन कॉरिडोर को इसी तरह के संतुलन का उदाहरण माना जा रहा है।
ऐतिहासिक महत्व वाला मार्ग
कंडी मार्ग का इतिहास भी काफी पुराना है। लगभग दो सौ वर्षों से यह रास्ता गढ़वाल के कोटद्वार और कुमाऊं के रामनगर के बीच संपर्क का प्रमुख माध्यम रहा है। हालांकि, कॉर्बेट नेशनल पार्क बनने के बाद इस मार्ग पर पहले व्यावसायिक और बाद में निजी वाहनों की आवाजाही पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके बाद से यह मार्ग धीरे-धीरे बंद होता चला गया।
दूरी कम होने से मिलेगा बड़ा लाभ
यदि कंडी मार्ग का निर्माण होता है, तो गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों के बीच की दूरी करीब 80 किलोमीटर तक कम हो सकती है। इससे न केवल यात्रा आसान होगी, बल्कि व्यापार, पर्यटन और स्थानीय विकास को भी गति मिलेगी। इस परियोजना को राज्य के बुनियादी ढांचे के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है।
राजनीतिक प्रतिक्रिया भी आई सामने
इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिल रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने इस परियोजना को लेकर सरकार पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि इतने बड़े मौके पर इस महत्वपूर्ण मार्ग की मांग को प्रमुखता नहीं दी गई। उनका सुझाव है कि यदि वन्यजीवों की चिंता है, तो तकनीकी समाधान अपनाकर इस मार्ग को विकसित किया जा सकता है।
विकास और संरक्षण के बीच संतुलन जरूरी
पूरे मामले में सबसे अहम बात विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की है। एक ओर सड़क निर्माण से लोगों को सुविधा मिलेगी, वहीं दूसरी ओर वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना भी जरूरी है। ऐसे में ग्रीन कॉरिडोर जैसी तकनीक इस दिशा में एक महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में उभर रही है।



