उत्तराखण्ड

UCCDebate – समान नागरिक संहिता पर AIMPLB ने जताई गंभीर आपत्ति

UCCDebate – ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हाल ही में गुजरात विधानसभा द्वारा पारित समान नागरिक संहिता विधेयक और उत्तराखंड में लागू इस कानून को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। बोर्ड का कहना है कि यह कदम संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर असर डाल सकता है। इस मुद्दे को लेकर जारी बयान में बोर्ड ने कई कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को सामने रखा है।

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नाम और स्वरूप को लेकर उठाए सवाल

बोर्ड का कहना है कि जिस कानून को समान नागरिक संहिता कहा जा रहा है, वह अपने स्वरूप में पूरी तरह समान नहीं है। उनके अनुसार, गुजरात में प्रस्तावित कानून न तो पूरे देश में लागू है और न ही राज्य के भीतर सभी वर्गों पर एक समान प्रभाव डालता है।

विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों को इससे बाहर रखा गया है, जिससे इसे वास्तविक अर्थों में समान संहिता कहना उचित नहीं माना जा सकता।

मौलिक अधिकारों पर प्रभाव की चिंता

बोर्ड ने इस विधेयक को संविधान की भावना के विपरीत बताते हुए कहा कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत अधिकारों जैसे मूलभूत अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।

उनका तर्क है कि इस तरह का कानून लागू करते समय यह सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी भी समुदाय के अधिकारों का हनन न हो और सभी नागरिकों के हितों का संतुलन बना रहे।

नीति निर्देशक सिद्धांतों का हवाला

बयान में यह भी कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का उल्लेख नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में किया गया है। इसका मतलब यह है कि इसे लागू करना अनिवार्य नहीं है, बल्कि यह राज्य के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है।

बोर्ड का मानना है कि इसे लागू करने से पहले व्यापक सहमति और संवाद आवश्यक है, ताकि किसी भी प्रकार का विवाद या असंतोष न उत्पन्न हो।

अंबेडकर के विचारों का उल्लेख

बोर्ड ने संविधान सभा की बहसों का जिक्र करते हुए कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी इस बात पर जोर दिया था कि ऐसे किसी कानून को लोगों की सहमति के बिना लागू नहीं किया जाना चाहिए।

इस संदर्भ में बोर्ड ने यह भी कहा कि पहले के विधि आयोगों ने भी इस विषय पर राय लेते समय इसे तत्काल लागू करने की आवश्यकता पर सवाल उठाए थे।

परामर्श प्रक्रिया पर उठे सवाल

बोर्ड ने गुजरात में इस विधेयक से पहले अपनाई गई प्रक्रिया को लेकर भी चिंता जताई है। उनका कहना है कि जनता से सुझाव लेने के लिए समिति तो बनाई गई, लेकिन उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई।

इससे पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं और यह संदेह पैदा होता है कि क्या सभी पक्षों की राय को सही तरीके से शामिल किया गया।

व्यापक चर्चा की जरूरत पर जोर

बोर्ड का कहना है कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दों पर जल्दबाजी में निर्णय लेने के बजाय व्यापक स्तर पर चर्चा और विचार-विमर्श होना चाहिए।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इस विषय पर अलग-अलग समुदायों की राय को महत्व देना जरूरी है, ताकि कोई भी निर्णय संतुलित और स्वीकार्य हो सके।

आगे की स्थिति पर नजर

फिलहाल गुजरात में यह विधेयक राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार कर रहा है। ऐसे में आने वाले समय में इस पर और बहस और प्रतिक्रियाएं सामने आने की संभावना है।

यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिस पर देशभर में चर्चा जारी है।

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