उत्तराखण्ड

Uttarakhand Forest Department News: उत्तराखंड वन विभाग में कैंपा फंड का खेल, रेंजर पैदल और अफसर चमचमाती गाड़ियों में सवार

Uttarakhand Forest Department News: उत्तराखंड के वन विभाग में संसाधनों के बंटवारे को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। जंगलों की सुरक्षा और वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आरक्षित ‘कैंपा’ (कंपनसेटरी एफोरेस्टेशन फंड मैनेजमेंट एंड प्लानिंग एथॉरिटी) फंड से खरीदी गई गाड़ियों के आवंटन में भारी अनियमितता सामने आई है। नियमों के मुताबिक, ये वाहन वनाग्नि और मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने के लिए फील्ड स्टाफ और रेंजों को दिए जाने थे। लेकिन हकीकत इसके उलट है; रेंजर और वनकर्मी आज भी टूटी-फूटी गाड़ियों या पैदल पेट्रोलिंग करने को मजबूर हैं, जबकि विभाग के ऊंचे पदों पर बैठे अधिकारी इन नई गाड़ियों का लुत्फ उठा रहे हैं।

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रेंजों को नजरअंदाज कर अधिकारियों ने बांटे वाहन

हाल ही में विभाग (Uttarakhand Forest Department News) ने कैंपा फंड के जरिए 23 बोलेरो कैंपर और 8 बोलेरो नियो गाड़ियां खरीदी थीं। उम्मीद थी कि इन वाहनों से सुदूर रेंजों में तैनात कर्मचारियों को मदद मिलेगी, लेकिन अधिकारियों ने बोलेरो नियो जैसी आरामदायक गाड़ियों को आपस में ही बांट लिया। ये गाड़ियां अब जिला वन अधिकारियों (DFO) और उप वन अधिकारियों (SDO) के बेड़े की शोभा बढ़ा रही हैं। रेंजों के लिए खरीदी गई बोलेरो कैंपर में से भी केवल कुछ ही फील्ड तक पहुंच पाईं। हैरानी की बात यह है कि कैंपा की स्पष्ट गाइडलाइन है कि इस फंड से रेंजर स्तर से ऊपर के अधिकारियों के लिए वाहन नहीं खरीदे जा सकते, फिर भी नियमों को ताक पर रखकर यह बंदरबांट की गई।

जान जोखिम में डाल रहे वनकर्मी और वेतन से कटती रकम

वन विभाग के भीतर की स्थिति काफी चिंताजनक है। प्रदेश में कुल 308 रेंजर पदों में से 235 पर तैनाती है, जिनमें से करीब सौ रेंजरों के पास कोई सरकारी वाहन नहीं है। लगभग 35 रेंजर ऐसे पुराने वाहनों का इस्तेमाल कर रहे हैं जिनकी फिटनेस खत्म हो चुकी है और वे चलने लायक नहीं हैं। अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए करीब 26 रेंजरों ने तो सरकारी वाहन छोड़कर निजी गाड़ियों से ड्यूटी करना शुरू कर दिया है। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अनुसार, पुराने और खस्ताहाल वाहनों के कारण बीते दो वर्षों में दो रेंजर अपनी जान गंवा चुके हैं। विडंबना यह है कि जर्जर वाहन देने के बावजूद रेंजरों के वेतन से हर महीने वाहन मद में दो हजार रुपये की कटौती की जा रही है और तेल के लिए भी बजट नहीं मिल रहा।

आईफोन की खरीद से लेकर कैग की आपत्तियों तक

यह पहली बार नहीं है जब कैंपा फंड के दुरुपयोग के आरोप लगे हों। इससे पहले भी अधिकारियों के लिए महंगे आईफोन और लैपटॉप खरीदने का मामला सुर्खियों में रहा था। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने अपनी रिपोर्ट में इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी और मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा था। सर्वोच्च अदालत ने इस गबन पर कार्रवाई के निर्देश दिए थे, लेकिन रसूखदार अधिकारियों के खिलाफ अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। फंड का इस्तेमाल जंगलों को बचाने के बजाय अधिकारियों की विलासिता के लिए होना विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

वन मंत्री ने दिए जांच और सख्त कार्रवाई के संकेत

मामले के तूल पकड़ने के बाद वन मंत्री सुबोध उनियाल ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा है कि यदि फील्ड के लिए आवंटित गाड़ियां अधिकारियों द्वारा निजी या कार्यालयी उपयोग में ली जा रही हैं, तो यह नियमों का सीधा उल्लंघन है। उन्होंने जांच के आदेश देते हुए स्पष्ट किया कि वाहनों का वितरण कैंपा की गाइडलाइन के अनुसार ही सुनिश्चित कराया जाएगा। दूसरी ओर, रेंजर संघ और कर्मचारी संगठनों ने प्रमुख सचिव वन को पत्र लिखकर इस धांधली की उच्च स्तरीय जांच और जिम्मेदार अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई की मांग की है।

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