Supreme Court – नशे में नाबालिग ड्राइविंग हादसों पर अभिभावकों की जिम्मेदारी तय
Supreme Court – देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को बेहद कड़े शब्दों में कहा कि यदि कोई नाबालिग नशे में वाहन चलाकर दुर्घटना करता है, तो इसकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी उसके माता-पिता पर भी तय होनी चाहिए। न्यायालय ने इसे केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या बताया और बढ़ते सड़क हादसों पर गंभीर चिंता जताई। यह टिप्पणी जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने उस मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें मई 2024 में पुणे के कल्याणी नगर में एक नाबालिग द्वारा तेज रफ्तार लग्जरी कार चलाने से दो लोगों की मौत हो गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि नशे और लापरवाही को किसी भी रूप में ‘जश्न’ का नाम नहीं दिया जा सकता।

अदालत की तीखी मौखिक टिप्पणियां
सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह बेहद दुखद है कि कुछ अभिभावक अपने बच्चों को अत्यधिक आजादी देते हैं, महंगी कारें सौंप देते हैं और शराब या अन्य नशीले पदार्थों के सेवन को भी नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसी लापरवाही के परिणामस्वरूप निर्दोष लोग अपनी जान गंवा देते हैं, जबकि जिम्मेदार लोग बच निकलने की कोशिश करते हैं। पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि यह कोई अलग-थलग घटना नहीं है, बल्कि देश के कई शहरों में ऐसे हादसों की प्रवृत्ति देखने को मिल रही है।
माता-पिता की भूमिका पर सवाल
न्यायालय ने कहा कि आधुनिक जीवनशैली में कई अभिभावक अपने बच्चों के साथ समय बिताने के बजाय उन्हें पैसा, मोबाइल फोन और क्रेडिट कार्ड थमा देते हैं। अदालत के अनुसार, यह रवैया बच्चों में अनुशासन और जिम्मेदारी की भावना को कमजोर करता है। पीठ ने माना कि यह एक सामाजिक समस्या है, जिससे निपटने के लिए केवल कानून पर्याप्त नहीं है; परिवारों को भी अपनी भूमिका पर गंभीरता से विचार करना होगा।
जमानत देने की वजह
सुप्रीम कोर्ट ने रक्त नमूने बदलने और साक्ष्यों से छेड़छाड़ के आरोप में गिरफ्तार तीन आरोपियों—आशीष सतीश मित्तल, आदित्य अविनाश सूद और अमर संतोष गायकवाड़—को जमानत देते हुए कहा कि वे लंबे समय से हिरासत में हैं, इसलिए उन्हें रिहा किया जा रहा है। हालांकि, अदालत ने साफ किया कि इससे उनके खिलाफ लगे आरोप कमजोर नहीं होते और मामले की अंतिम सुनवाई अभी बाकी है। पीठ ने कहा कि फिलहाल विस्तृत टिप्पणी करने से बचा जा रहा है ताकि निचली अदालत में चल रही कार्यवाही प्रभावित न हो।
‘तयशुदा पैटर्न’ की बात
मृतक की मां के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि ऐसे मामलों में अक्सर एक पैटर्न देखने को मिलता है—किसी गरीब ड्राइवर को दोषी ठहराना, रक्त के नमूने बदलना और फिर हल्की सजा के बाद बाहर निकल जाना। जस्टिस नागरत्ना ने इस बात से सहमति जताते हुए कहा कि यह प्रवृत्ति बेहद चिंताजनक है और न्याय व्यवस्था के लिए चुनौती है।
हादसे की पृष्ठभूमि
यह दुर्घटना 19 मई 2024 को पुणे के कल्याणी नगर में हुई थी, जब एक नाबालिग ने तेज रफ्तार पोर्शे कार से दो मोटरसाइकिल सवार—अनीश अवधिया और अश्विनी कोष्टा—को टक्कर मार दी थी। दोनों की मौके पर ही मौत हो गई थी। जांच में आरोप लगा कि हादसे के बाद कार में बैठे नाबालिगों के रक्त नमूने बदल दिए गए और साक्ष्यों से छेड़छाड़ की गई।
किशोर न्याय बोर्ड का विवाद
मामला तब और सुर्खियों में आया जब किशोर न्याय बोर्ड ने नाबालिग आरोपी को बेहद सामान्य शर्तों पर जमानत दे दी, जिसमें 300 शब्दों का निबंध लिखना भी शामिल था। इस फैसले पर देशभर में तीखी प्रतिक्रिया हुई। बाद में पुणे पुलिस के अनुरोध पर बोर्ड ने अपने आदेश में संशोधन करते हुए नाबालिग को सुधार गृह भेज दिया, लेकिन जून में बॉम्बे हाईकोर्ट ने उसे रिहा कर दिया।
जांच का दायरा और गिरफ्तारियां
इसके बाद जांच का दायरा बढ़ा और नाबालिग के माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, ससून अस्पताल के डॉक्टर अजय तावरे और श्रीहरि हलनोर समेत करीब 10 लोगों को रक्त नमूने बदलने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। पुलिस का कहना है कि इस पूरे प्रकरण में एक संगठित प्रयास के तहत सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई।
अदालत ने अंत में कहा कि ऐसे मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता भी जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की त्रासदियां रोकी जा सकें।



