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EkadashiDates – फरवरी में विजया और रंगभरी एकादशी की तिथियां घोषित

EkadashiDates – फरवरी माह में फाल्गुन मास के दौरान आने वाली विजया एकादशी और रंगभरी एकादशी को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है। इस वर्ष विजया एकादशी 13 फरवरी को मनाई जाएगी, जबकि रंगभरी एकादशी 27 फरवरी को पड़ेगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विजया एकादशी का संबंध भगवान राम की विजय कथा से जुड़ा माना जाता है, वहीं रंगभरी एकादशी का जुड़ाव होली और काशी की परंपराओं से है। खास बात यह है कि विजया एकादशी इस बार महाशिवरात्रि से ठीक पहले पड़ रही है, जिससे इसका महत्व और भी बढ़ गया है।

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व्रत की शुरुआत और संकल्प की विधि

धार्मिक ग्रंथों में एकादशी व्रत की प्रक्रिया को विस्तार से बताया गया है। नारद पुराण के अनुसार यह व्रत भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय है और इसे श्रद्धा से करने पर मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। व्रत की शुरुआत दशमी तिथि से मानी जाती है। इस दिन प्रातः स्नान कर मन और इंद्रियों को संयमित रखने का संकल्प लिया जाता है। भगवान विष्णु का विधिपूर्वक पूजन कर रात्रि में उनका स्मरण करते हुए विश्राम किया जाता है। यह तैयारी मन को स्थिर करने और अगले दिन के उपवास के लिए आवश्यक मानी जाती है।

एकादशी के दिन की पूजा और नियम

एकादशी तिथि पर प्रातःकाल स्नान के बाद गंध, पुष्प और अन्य पूजन सामग्री से भगवान विष्णु की आराधना की जाती है। व्रती निराहार रहकर उपवास का पालन करते हैं और भगवान से शरण व आशीर्वाद की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक परंपरा के अनुसार दिनभर भक्ति-भाव में रहकर भजन, कीर्तन और पुराणों का श्रवण करना शुभ माना गया है। कई स्थानों पर रात्रि जागरण की भी परंपरा है, जिसमें भक्त सामूहिक रूप से हरिनाम संकीर्तन करते हैं। द्वादशी तिथि पर प्रातः स्नान कर भगवान विष्णु का पुनः पूजन किया जाता है और व्रत का पारण विधि अनुसार किया जाता है।

विजया एकादशी की तिथि और शुभ योग

पंचांग के अनुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 12 फरवरी को प्रातः 11 बजकर 7 मिनट से आरंभ होगी और 13 फरवरी को दोपहर 1 बजकर 6 मिनट तक रहेगी। इस दिन मूल नक्षत्र और जयद योग का संयोग बन रहा है, जिसे धार्मिक दृष्टि से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि भगवान राम ने लंका विजय से पहले इसी एकादशी का व्रत किया था, जिससे उन्हें सफलता प्राप्त हुई। इसी कारण इसे ‘विजया’ एकादशी कहा जाता है। शिवरात्रि से पहले पड़ने के कारण कई श्रद्धालु इस दिन विशेष पूजा-अर्चना भी करते हैं।

रंगभरी एकादशी का धार्मिक महत्व

रंगभरी एकादशी, जिसे आमलकी एकादशी भी कहा जाता है, फाल्गुन शुक्ल पक्ष में आती है। इस बार इसकी तिथि 26 फरवरी की रात 12 बजकर 6 मिनट से प्रारंभ होकर 27 फरवरी को दोपहर 1 बजकर 49 मिनट तक रहेगी। उत्तर भारत, विशेषकर काशी में इस दिन का विशेष महत्व है। मान्यता है कि विवाह के बाद माता गौरा पहली बार भगवान शिव के साथ काशी आई थीं और उनके स्वागत में रंग-गुलाल उड़ाया गया था। तभी से इस दिन रंगोत्सव की परंपरा चली आ रही है।

काशी और खाटू श्याम में विशेष आयोजन

वाराणसी में रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ मंदिर परिसर में विशेष पूजा और शोभायात्रा का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु गुलाल अर्पित कर उत्सव मनाते हैं। वहीं राजस्थान के खाटू श्याम मंदिर में भी इस अवसर पर भव्य मेला लगता है। देश के विभिन्न हिस्सों से भक्त यहां पहुंचते हैं और भगवान श्याम के दर्शन करते हैं। मंदिर परिसर में भजन-कीर्तन और धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिससे पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठता है।

धार्मिक आस्था और सामाजिक उत्सव का संगम

फरवरी में आने वाली ये दोनों एकादशी तिथियां केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी महत्वपूर्ण हैं। विजया एकादशी आत्मसंयम और विजय का संदेश देती है, जबकि रंगभरी एकादशी उत्साह और रंगों के माध्यम से जीवन में आनंद का प्रतीक बनती है। श्रद्धालु इन दिनों में व्रत, पूजा और दान के माध्यम से आध्यात्मिक संतुलन की खोज करते हैं। पंचांग के अनुसार तिथियों का ध्यान रखते हुए पूजा करना शुभ माना जाता है।

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