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BoardExamStress – बोर्ड परीक्षाओं में बच्चों पर छिपा मानसिक दबाव

BoardExamStress – बोर्ड परीक्षाओं का समय आते ही अधिकांश घरों का माहौल बदल जाता है। दिनचर्या से लेकर बातचीत तक सब कुछ पढ़ाई के इर्द-गिर्द घूमने लगता है। माता-पिता अपनी तरफ से हर संभव कोशिश करते हैं कि बच्चे को बेहतर माहौल और संसाधन मिलें। उनका उद्देश्य साफ होता है—बच्चा अच्छा प्रदर्शन करे और भविष्य सुरक्षित बने। लेकिन इसी कोशिश के बीच कई बार वे उन भावनात्मक पहलुओं को नहीं देख पाते, जिनसे बच्चा भीतर ही भीतर जूझ रहा होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि परीक्षा का तनाव सिर्फ किताबों या सिलेबस तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह बच्चे की आत्मछवि और आत्मविश्वास से भी जुड़ जाता है।

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परीक्षा सिर्फ अंक नहीं, पहचान बन जाती है

मनोचिकित्सक डॉ. चांदनी तुगनैत बताती हैं कि माता-पिता के लिए बोर्ड परीक्षा जीवन का एक चरण भर होती है, लेकिन बच्चों के लिए यह उनकी योग्यता का पैमाना बन जाती है। कई विद्यार्थी यह मान लेते हैं कि जो अंक आएंगे, वही उनकी काबिलियत तय करेंगे। यही सोच धीरे-धीरे दबाव में बदल जाती है। पढ़ाई सीखने की प्रक्रिया न रहकर डर से बचने का साधन बन जाती है। ऐसे में बच्चा असफलता के डर से ज्यादा परेशान रहता है, न कि सवालों की कठिनाई से।

तुलना से बढ़ता है आत्म-संदेह

अक्सर घरों में यह सुनने को मिलता है कि अमुक दोस्त कितना पढ़ रहा है या उसके कितने अच्छे नंबर आते हैं। अभिभावकों को लगता है कि इससे प्रेरणा मिलेगी, लेकिन मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि तुलना बच्चों के आत्मविश्वास को कमजोर कर सकती है। बच्चा अपनी गति और मेहनत को नजरअंदाज कर दूसरों से खुद की तुलना करने लगता है। इससे आत्म-संदेह पैदा होता है और पढ़ाई बोझिल महसूस होने लगती है। हर बच्चा अलग होता है और उसकी सीखने की गति भी भिन्न होती है।

लगातार निगरानी से थकान

‘कितना पढ़ा?’, ‘सिलेबस पूरा हुआ या नहीं?’ जैसे सवाल माता-पिता के लिए सामान्य हो सकते हैं, लेकिन बच्चे इन्हें लगातार दबाव की तरह महसूस कर सकते हैं। जब हर बातचीत पढ़ाई तक सीमित हो जाती है, तो बच्चा यह सोचने लगता है कि उसकी कोशिश कभी पर्याप्त नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, निरंतर निगरानी से मानसिक थकान बढ़ती है और पढ़ाई के प्रति रुचि कम हो सकती है। संतुलित संवाद और भरोसा इस स्थिति को बेहतर बना सकते हैं।

माता-पिता की चिंता का असर

अभिभावक अक्सर अपने तनाव को छिपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन बच्चे भावनाओं को आसानी से महसूस कर लेते हैं। अगर घर का माहौल चिंतित या तनावपूर्ण है, तो बच्चे भी अनजाने में उसी तनाव को ग्रहण कर लेते हैं। उन्हें लगता है कि परीक्षा कोई बहुत बड़ी और डरावनी चुनौती है। इससे उनकी चिंता और बढ़ सकती है। शांत और सकारात्मक माहौल बच्चे को मानसिक रूप से स्थिर रख सकता है।

रिजल्ट को जीवन से जोड़ने का खतरा

कई बार अनजाने में कह दिया जाता है कि यही परीक्षा भविष्य तय करेगी या गलती की गुंजाइश नहीं है। ऐसे वाक्य बच्चों के मन में गहरा असर छोड़ते हैं। जब परिणाम को जीवन की दिशा से जोड़ दिया जाता है, तो गलती का डर बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक दबाव में दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है और याद की गई बातें भी भूल सकती हैं। इसलिए संतुलित दृष्टिकोण जरूरी है।

विशेषज्ञों की सलाह

डॉ. तुगनैत के अनुसार, परीक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन बच्चों की मानसिक शांति उससे भी अधिक जरूरी है। भरोसा, सहानुभूति और यह संदेश कि प्यार परिणाम पर निर्भर नहीं करता, बच्चों को मजबूती देता है। परीक्षा कुछ दिनों की होती है, लेकिन उस समय मिली भावनात्मक समझ जीवनभर साथ रहती है।

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