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Mind control and spiritual guidance: प्रेमानंद महाराज ने बताया आखिर किसके हाथ में है आपके जीवन का रिमोट कंट्रोल…

Mind control and spiritual guidance: अक्सर हमें महसूस होता है कि हमारे विचार हमारे काबू में नहीं हैं और हम न चाहते हुए भी गलत दिशा में खिंचे चले जाते हैं। यह समस्या आज के दौर में लगभग हर व्यक्ति के साथ है, जहाँ मन की चंचलता मानसिक शांति को भंग कर देती है। वृंदावन के प्रसिद्ध संत श्री प्रेमानंद महाराज ने इस उलझन को सुलझाते हुए (Psychological aspects of self control) पर गहरा प्रकाश डाला है। उन्होंने एकांतित वार्तालाप के दौरान एक श्रद्धालु के सवाल का जवाब देते हुए स्पष्ट किया कि हमारे भीतर चल रहे इस द्वंद्व का असली स्वामी कौन है और हम कहाँ चूक कर रहे हैं।

Mind control and spiritual guidance
Mind control and spiritual guidance

शरीर एक रथ और इंद्रियां हैं इसके बेकाबू घोड़े

प्रेमानंद महाराज ने जीवन की तुलना एक प्राचीन रथ से करते हुए इसे समझने का सबसे सरल तरीका बताया है। उनके अनुसार, हमारा यह भौतिक शरीर एक रथ की भांति है और हमारी पांचों (Sensory organs and human desires) इस रथ को खींचने वाले घोड़ों के समान हैं। ये घोड़े हमेशा विषयों की ओर भागना चाहते हैं। यदि इन घोड़ों पर नियंत्रण न हो, तो जीवन का यह रथ कभी भी दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है। महाराज जी कहते हैं कि इंद्रियों के इन घोड़ों को अनुशासित करना ही आध्यात्मिकता की पहली सीढ़ी है।

मन है लगाम और बुद्धि के हाथ में है ड्राइविंग सीट

जिस तरह किसी रथ को चलाने के लिए लगाम और सारथी की आवश्यकता होती है, वैसे ही हमारे जीवन में मन एक लगाम की भूमिका निभाता है। (The role of intellect in decision making) को समझाते हुए महाराज जी ने बताया कि बुद्धि ही वह सारथी या ड्राइवर है जिसे मन रूपी लगाम को थामना चाहिए। यदि आपकी बुद्धि सजग और विवेकपूर्ण है, तो वह मन को भटकने नहीं देगी। लेकिन अगर ड्राइवर यानी बुद्धि ही कमजोर पड़ जाए, तो मन की लगाम ढीली हो जाती है और इंद्रियों के घोड़े रथ को कहीं भी ले जाकर ठोक सकते हैं।

आत्मा है इस पूरे सफर का असली रथी

इस जीवन रूपी रथ में जो यात्री बैठा है, वह हमारी जीवात्मा है। महाराज जी के अनुसार, आत्मा रथी के रूप में विराजमान है, जिसका लक्ष्य परम आनंद की प्राप्ति करना है। (Soul and its spiritual journey) को सुखद बनाने के लिए यह जरूरी है कि सारथी यानी बुद्धि पूरी तरह होश में रहे। यदि बुद्धि सही दिशा में काम करती है और मन को वश में रखती है, तभी आत्मा को उस दिव्य आनंद का अनुभव हो सकता है जिसके लिए यह मानव देह मिली है।

आज के दौर में क्यों हो रही है इंसान की दुर्गति

वर्तमान समय में स्थिति बिल्कुल इसके विपरीत हो गई है, जहाँ इंद्रियां इतनी शक्तिशाली हो गई हैं कि उन्होंने मन को अपना गुलाम बना लिया है। (Lack of mental discipline in modern life) की चर्चा करते हुए प्रेमानंद महाराज ने कहा कि आज हमारी बुद्धि ‘बावरी’ हो गई है, जिसने लगाम को पूरी तरह छोड़ दिया है। बुद्धि अब मन के अनुसार नाच रही है, जिससे इंसान की दुर्गति तय है। जब सारथी ही नशे में हो या असमर्थ हो जाए, तो रथ का गिरना निश्चित है, और यही आज के अशांत समाज का मुख्य कारण है।

बुद्धि को प्रवीण बनाना है सुरक्षा की गारंटी

अगर हम चाहते हैं कि हमारा जीवन सुरक्षित रहे और हम सही मार्ग पर चलें, तो हमें अपनी बुद्धि को पवित्र और प्रवीण बनाना होगा। (Importance of wisdom and discernment) को रेखांकित करते हुए महाराज जी ने कहा कि एक कुशल सारथी ही रथी को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचा सकता है। यदि आपकी बुद्धि सतमार्ग पर है, तो वह इंद्रियों के घोड़ों को गलत रास्तों से हटाकर भक्ति और संयम के मार्ग पर मोड़ देगी। बुद्धि का स्थिर होना ही जीवन की सफलता की सबसे बड़ी कुंजी है।

नियम और संयम से सतमार्ग की ओर बढ़ते कदम

इंद्रियों के घोड़ों को पवित्र मार्ग पर चलाने के लिए रात-दिन नियम और संयम का पालन करना अनिवार्य है। (Daily discipline and spiritual practice) के बिना मन को वश में करना असंभव है। जब हम शास्त्रों के अनुसार और संतों के सानिध्य में अपनी बुद्धि को तराशते हैं, तो वह सशक्त होकर मन रूपी लगाम को कस लेती है। संयमित जीवन ही वह माध्यम है जिससे हम अपनी इंद्रियों को विषयों के जहर से बचाकर अमृत की ओर ले जा सकते हैं।

पवित्र बुद्धि ही दिलाएगी आत्मानंद का अनुभव

अंततः सारा खेल हमारी बुद्धि की पवित्रता पर टिका हुआ है। प्रेमानंद महाराज जी ने जोर देकर कहा कि यदि सारथी सही नहीं होगा, तो वह रथी को कहीं न कहीं फंसा ही देगा। (Attaining inner peace through spirituality) के लिए अपनी बुद्धि को प्रभु के चरणों में समर्पित करना होगा। जब बुद्धि सात्विक होती है, तो वह मन और इंद्रियों को स्वतः ही ईश्वर की ओर मोड़ देती है, जिससे मनुष्य को इस नश्वर संसार में रहते हुए भी शाश्वत आनंद की अनुभूति होने लगती है।

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