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HoliFestival – उत्तर प्रदेश के अनोखे शहरों में अलग अंदाज की होली

HoliFestival – होली का नाम आते ही सबसे पहले मथुरा और वृंदावन की तस्वीर आंखों के सामने उभरती है। वहां की लट्ठमार होली, फूलों की होली और रंगों का उत्सव दुनियाभर में चर्चित है। लेकिन उत्तर प्रदेश सिर्फ ब्रज क्षेत्र तक सीमित नहीं है। प्रदेश के कई अन्य शहर भी हैं, जहां होली अपनी अलग परंपरा और विशिष्ट शैली के कारण पहचानी जाती है। इन शहरों में मनाया जाने वाला उत्सव इतिहास, लोककथाओं और सामाजिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। यदि इस बार आप पारंपरिक रंगों से हटकर कुछ नया देखने की सोच रहे हैं, तो इन जगहों की होली आपके लिए अलग अनुभव साबित हो सकती है।

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काशी में श्मशान की अनोखी परंपरा

वाराणसी, जिसे काशी या बनारस के नाम से भी जाना जाता है, अपनी आध्यात्मिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है। यहां की होली भी इसी आध्यात्मिक रंग में रंगी दिखाई देती है। काशी में मसान होली की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। मान्यता है कि यहां होली के अवसर पर श्मशान घाट पर विशेष आयोजन होता है, जहां साधु-संत और स्थानीय लोग एकत्रित होते हैं। रंगों की जगह यहां चिता की राख का प्रयोग किया जाता है। गंगा तट पर गूंजते भजन और ढोल की थाप के बीच यह आयोजन शहर की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को दर्शाता है। यह परंपरा जीवन और मृत्यु के दार्शनिक विचार को भी सामने लाती है, जो काशी की संस्कृति का मूल तत्व है।

प्रयागराज में लोकनाथ की ऐतिहासिक होली

प्रयागराज की होली भी अपने अलग अंदाज के लिए जानी जाती है। यहां लोकनाथ क्षेत्र में मनाया जाने वाला उत्सव प्रदेश की प्रमुख होलियों में गिना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह आयोजन लंबे समय से होता आ रहा है और इसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होते हैं। कहा जाता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला भी इस उत्सव में भाग ले चुके हैं। यहां लोग एक-दूसरे को रंग लगाने के साथ पारंपरिक तरीके से बधाई देते हैं। पूरे क्षेत्र में एक समान रंग और उत्साह दिखाई देता है, जो सामूहिकता की भावना को मजबूत करता है।

कानपुर में आठ दिन तक चलता उत्सव

कानपुर की होली की कहानी इतिहास से जुड़ी हुई है। यहां यह पर्व कई दिनों तक मनाया जाता है और इसका समापन गंगा मेले के साथ होता है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, स्वतंत्रता से पहले व्यापारियों ने होली के दौरान अपनी दुकानें बंद रखीं, जिसका विरोध ब्रिटिश प्रशासन ने किया। जब व्यापारियों ने आदेश मानने से इनकार किया, तो कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके विरोध में लोगों ने लगातार होली खेलना जारी रखा और बाजार बंद रखे। अंततः प्रशासन को झुकना पड़ा और सभी को रिहा किया गया। जिस दिन रिहाई हुई, उसी दिन से गंगा मेला मनाने की परंपरा शुरू हुई। आज भी इस आयोजन के बाद ही बाजार खुलते हैं।

शाहजहांपुर में परंपरा और प्रतीकात्मक जुलूस

शाहजहांपुर में होली से जुड़ी एक अलग ही परंपरा देखने को मिलती है, जो कई दशक पुरानी बताई जाती है। यहां होली से कुछ दिन पहले सार्वजनिक स्थलों को सुरक्षित रखने की तैयारी की जाती है। त्योहार के दिन एक प्रतीकात्मक जुलूस निकाला जाता है, जिसमें एक व्यक्ति को पारंपरिक वेशभूषा में सजाकर गधे पर बैठाया जाता है। उसके चेहरे पर कालिख लगाई जाती है और शहर में घुमाया जाता है। इसे अंग्रेजी शासन के प्रतीकात्मक विरोध के रूप में देखा जाता है। स्थानीय लोग इसे ऐतिहासिक स्मृति और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा मानते हैं।

हमीरपुर में महिलाओं की अनोखी बारात

हमीरपुर की होली लगभग तीन शताब्दियों पुरानी परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। यहां उत्सव की शुरुआत महिलाओं की विशेष बारात से होती है। गांव की महिलाएं एकत्रित होकर धार्मिक स्थल से शोभायात्रा निकालती हैं, जिसमें पुरुष शामिल नहीं होते। इसके बाद पारंपरिक तरीके से दूल्हे की बारात निकाली जाती है। पूरे आयोजन में संगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन सुनाई देती है। अंत में महिलाएं रस्में निभाती हैं और फिर पूरे गांव में रंगोत्सव मनाया जाता है।

उत्तर प्रदेश के इन शहरों की होली यह बताती है कि एक ही त्योहार कितने विविध रूपों में मनाया जा सकता है। हर शहर की अपनी कहानी है, जो उसे खास बनाती है।

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