DefenceDeals – वायुसेना को मिलेगी नई ताकत, बड़े रक्षा सौदों की तैयारी
DefenceDeals – भारतीय वायुसेना की क्षमता को और मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार आने वाले वित्तीय वर्ष 2026-27 में कई बड़े रक्षा समझौते करने की तैयारी में है। रक्षा मंत्रालय ने संसद की एक समिति के सामने यह जानकारी साझा की है कि इन योजनाओं में उन्नत लड़ाकू विमान, परिवहन विमान और निगरानी प्रणालियों की खरीद शामिल है। इन सौदों का उद्देश्य वायुसेना को आधुनिक तकनीक से लैस करना और भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करना है।

पूंजीगत बजट में उल्लेखनीय वृद्धि
रक्षा मामलों की संसदीय स्थायी समिति की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, 2025-26 के मुकाबले वायुसेना के पूंजीगत बजट में करीब 37.03 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। यह वृद्धि इस बात का संकेत है कि सरकार रक्षा क्षेत्र में आधुनिकीकरण को प्राथमिकता दे रही है। इस अतिरिक्त बजट का उपयोग नए फाइटर जेट्स, निगरानी सिस्टम, परिवहन विमान और ड्रोन जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों की खरीद के लिए किया जाएगा, जिससे वायुसेना की समग्र कार्यक्षमता में सुधार आएगा।
114 राफेल जेट्स की प्रस्तावित खरीद
मल्टी-रोल फाइटर एयरक्राफ्ट कार्यक्रम के तहत 114 नए राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की योजना बनाई गई है। इस परियोजना को पहले ही रक्षा अधिग्रहण परिषद से मंजूरी मिल चुकी है। अनुमान है कि इस सौदे की कुल लागत लगभग 3.25 लाख करोड़ रुपये हो सकती है। खास बात यह है कि इन विमानों का निर्माण ‘मेक इन इंडिया’ पहल के तहत देश में ही किया जाएगा, जिसमें फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एविएशन एक भारतीय साझेदार के साथ मिलकर काम करेगी। इससे न केवल सैन्य क्षमता बढ़ेगी, बल्कि घरेलू रक्षा उद्योग को भी मजबूती मिलेगी।
पुराने परिवहन विमानों के स्थान पर नए MTA
वायुसेना के पुराने हो चुके एएन-32 विमानों को बदलने के लिए 60 मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट खरीदने की योजना भी आगे बढ़ रही है। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 1 लाख करोड़ रुपये बताई जा रही है। योजना के तहत कुछ विमान सीधे विदेश से खरीदे जाएंगे, जबकि अधिकांश का निर्माण भारत में ही किया जाएगा। इस सौदे में एम्ब्रेयर, लॉकहीड मार्टिन और एयरबस जैसी वैश्विक कंपनियां प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं। इससे परिवहन क्षमता में सुधार के साथ-साथ आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा।
निगरानी और युद्ध समर्थन प्रणालियों पर जोर
आधुनिक युद्ध में केवल लड़ाकू विमान ही नहीं, बल्कि निगरानी और संचार प्रणाली भी अहम भूमिका निभाती हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम और अन्य उन्नत प्लेटफॉर्म की खरीद पर भी जोर दिया जा रहा है। ये सिस्टम युद्ध के दौरान दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने, रणनीतिक निर्णय लेने और समन्वय स्थापित करने में मदद करते हैं। रक्षा मंत्रालय का मानना है कि ऐसे उपकरण वायुसेना की संचालन क्षमता को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने की पहल
वायुसेना ने तकनीकी नवाचार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए ‘डायरेक्टरेट ऑफ एयरोस्पेस डिजाइन’ नाम से एक नया ढांचा तैयार किया है। यह इकाई उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और शैक्षणिक संगठनों के साथ मिलकर नई तकनीकों पर काम कर रही है। इसका उद्देश्य देश में विकसित संसाधनों को रक्षा जरूरतों के अनुरूप ढालना और विदेशी निर्भरता को कम करना है। यह पहल लंबे समय में भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।