CensusCase – जाति आधारित गणना मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
CensusCase – सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक अहम सुनवाई के दौरान 2027 की जनगणना में विमुक्त, घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों की अलग से गणना कराने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि इस तरह के मुद्दे नीति निर्माण से जुड़े होते हैं और इन पर फैसला लेना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। साथ ही, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कड़ी टिप्पणी करते हुए समाज में बढ़ते वर्गीकरण पर चिंता भी जताई।

अदालत की टिप्पणी में सामाजिक चिंता झलकी
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि देश को जाति आधारित विभाजन से आगे बढ़कर एक समावेशी समाज की ओर जाना चाहिए था, लेकिन इसके उलट नई-नई श्रेणियों की मांग बढ़ती जा रही है। अदालत की टिप्पणी से यह संकेत मिला कि वह इस तरह की मांगों को सामाजिक दृष्टिकोण से भी संवेदनशील मानती है।
नीतिगत मामलों में दखल से किया इनकार
पीठ ने स्पष्ट किया कि जनगणना में किन-किन वर्गों को शामिल करना है या किस तरह का वर्गीकरण करना है, यह पूरी तरह सरकार और संबंधित विशेषज्ञ संस्थाओं का विषय है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होता है और इस याचिका में उठाया गया मुद्दा न्यायिक समीक्षा के दायरे में नहीं आता।
याचिकाकर्ता की दलील और ऐतिहासिक संदर्भ
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि विमुक्त और घुमंतू समुदायों को लंबे समय से ऐतिहासिक उपेक्षा का सामना करना पड़ा है। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश शासन के दौरान इन्हें आपराधिक जनजाति घोषित कर दिया गया था, जिसका सामाजिक असर आज भी दिखाई देता है। उनका कहना था कि मौजूदा जनगणना व्यवस्था में इन समुदायों की अलग पहचान नहीं हो पाती, जिससे उनकी वास्तविक आबादी का आंकलन मुश्किल हो जाता है।
अलग श्रेणी की मांग के पीछे तर्क
याचिका में यह भी कहा गया कि देश में इन समुदायों की संख्या करोड़ों में है, लेकिन स्वतंत्र भारत में कभी भी इन्हें अलग से नहीं गिना गया। इससे नीतिगत योजनाओं और कल्याणकारी कार्यक्रमों का लाभ इन तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पाता। विभिन्न आयोगों, जैसे रेनके और इदाते आयोग, ने भी समय-समय पर इनकी अलग पहचान सुनिश्चित करने की सिफारिश की है।
सीजेआई की सख्त टिप्पणी ने खींचा ध्यान
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि इस तरह की मांगों के पीछे व्यापक प्रभावों को समझना जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया कि समाज को और अधिक वर्गों में बांटने की प्रवृत्ति चिंता का विषय है। हालांकि, अदालत ने इन टिप्पणियों को अपने फैसले का आधार नहीं बनाया, बल्कि कानूनी दायरे में रहकर ही याचिका को खारिज किया।
याचिकाकर्ताओं को मिला वैकल्पिक रास्ता
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट दी कि वे अपनी मांग को लेकर संबंधित सरकारी विभागों या प्राधिकरणों के समक्ष जा सकते हैं। इसका मतलब है कि अब इस मुद्दे पर आगे की कार्रवाई पूरी तरह सरकार के निर्णय पर निर्भर करेगी।
सरकार के पाले में गया मामला
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह देखना अहम होगा कि केंद्र सरकार 2027 की जनगणना में इन समुदायों को लेकर क्या रुख अपनाती है। यदि सरकार चाहे तो विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों के आधार पर कोई नया प्रावधान शामिल कर सकती है।

