RajyaSabhaElection – झारखंड में राज्यसभा सीटों पर सियासी समीकरण तेज
RajyaSabhaElection – झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए होने वाला चुनाव अब केवल राज्य तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका असर बिहार और असम की राजनीति तक महसूस किया जा रहा है। बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच गठबंधन दलों के रिश्तों में खिंचाव साफ दिखाई दे रहा है। ऐसे हालात में भारतीय जनता पार्टी इस स्थिति को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश में जुटी हुई है। हालांकि, विधानसभा में संख्या बल को देखते हुए महागठबंधन अभी भी मजबूत स्थिति में है, लेकिन अंदरूनी मतभेद भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं।

गठबंधन के भीतर मतभेद ने बढ़ाई राजनीतिक हलचल
असम विधानसभा चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद कांग्रेस और झामुमो के बीच असहजता बढ़ी है। यही तनाव अब राज्यसभा चुनाव में भी असर डालता दिख रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर यह खटपट बढ़ती है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिल सकता है। गठबंधन की एकजुटता इस चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाएगी।
चार संभावित समीकरणों पर टिकी नजर
राज्यसभा चुनाव को लेकर चार प्रमुख संभावनाएं सामने आ रही हैं, जिन पर सभी दलों की रणनीति आधारित है। पहले विकल्प में झामुमो दो उम्मीदवार उतार सकता है, जबकि कांग्रेस और भाजपा एक-एक प्रत्याशी मैदान में ला सकते हैं। इस स्थिति में झामुमो की एक सीट लगभग तय मानी जा रही है, जबकि दूसरी सीट पर कड़ा मुकाबला संभव है।
दूसरे विकल्प में झामुमो, कांग्रेस और भाजपा एक-एक उम्मीदवार उतारें। इस स्थिति में झामुमो की जीत लगभग सुनिश्चित मानी जा रही है, लेकिन कांग्रेस की जीत गठबंधन की एकजुटता पर निर्भर करेगी। यदि मतभेद बढ़ते हैं, तो भाजपा को मौका मिल सकता है।
तीसरे समीकरण में झामुमो दो और भाजपा एक उम्मीदवार उतार सकती है। यहां भी झामुमो की पहली सीट सुरक्षित मानी जा रही है, लेकिन दूसरी सीट पर स्थिति पूरी तरह राजनीतिक एकजुटता पर निर्भर करेगी। अगर गठबंधन में दरार आई, तो भाजपा बाजी मार सकती है।
चौथे विकल्प में झामुमो और भाजपा एक-एक उम्मीदवार उतारें, तो दोनों का निर्विरोध चुना जाना संभव है। हालांकि, यह स्थिति फिलहाल कम संभावित मानी जा रही है।
संख्या बल में महागठबंधन की बढ़त
झारखंड विधानसभा के आंकड़ों पर नजर डालें तो एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 28 विधायकों का समर्थन जरूरी होता है। महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं, जिनमें झामुमो के 34, कांग्रेस के 16, राजद के 4 और माले के 2 विधायक शामिल हैं। इस आधार पर गठबंधन दोनों सीटों पर मजबूत दावेदारी रखता है।
वहीं, एनडीए के पास कुल 24 विधायक हैं, जिसमें भाजपा के 21 और अन्य सहयोगी दलों के 3 विधायक शामिल हैं। भाजपा को एक सीट जीतने के लिए अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा, जो मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में चुनौतीपूर्ण लेकिन असंभव नहीं माना जा रहा।
झामुमो की रणनीति पर टिकी नजरें
सबसे बड़ा सवाल यही है कि झामुमो अपनी दोनों सीटों पर दावा करेगा या कांग्रेस को एक सीट देकर गठबंधन धर्म निभाएगा। पार्टी ने अब तक अपने पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि, अंदरूनी सूत्रों का संकेत है कि झामुमो अपनी ताकत के आधार पर दोनों सीटों पर दावा ठोक सकता है। यह फैसला आगे की राजनीतिक दिशा तय करेगा।
भाजपा का आत्मविश्वास और बढ़ती सक्रियता
दूसरी ओर, भाजपा ने भी चुनाव को लेकर अपनी रणनीति तेज कर दी है। पार्टी के नेताओं का दावा है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां उनके पक्ष में हैं और वे चुनाव में मजबूत चुनौती पेश करेंगे। भाजपा इस चुनाव को सिर्फ राज्य स्तर पर नहीं, बल्कि व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रही है।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि क्या महागठबंधन अपनी एकजुटता बनाए रख पाता है या आंतरिक मतभेद भाजपा के लिए अवसर बनते हैं। फिलहाल झारखंड का यह चुनाव राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चा का केंद्र बना हुआ है।