CourtOrder – पटना हाईकोर्ट ने हत्या मामले में पांच आरोपियों को किया बरी
CourtOrder – पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सजा को खारिज करते हुए हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए गए पांचों आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने इस मामले की सुनवाई के दौरान साक्ष्यों में गंभीर खामियों की ओर इशारा किया और कहा कि केवल संदिग्ध आधारों पर सजा सुनाना न्यायसंगत नहीं है। साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित ट्रायल जज की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं और उन्हें फिलहाल आपराधिक मामलों की सुनवाई से अलग रखने का निर्देश दिया है।

मामला जूनियर इंजीनियर की हत्या से जुड़ा
यह पूरा मामला वर्ष 2017 में नवादा जिले में हुई जूनियर इंजीनियर उज्ज्वल राज की हत्या से संबंधित है। जानकारी के अनुसार, उज्ज्वल राज को उस समय गोली मार दी गई थी जब उन्होंने कथित तौर पर माप पुस्तिका में फर्जी प्रविष्टि करने से इनकार कर दिया था। घटना मारिया आश्रम के पास शाम के समय हुई थी, जिसने उस वक्त काफी सुर्खियां बटोरी थीं।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद की सजा
इस मामले में पुलिस ने पांच लोगों को आरोपी बनाया था, जिनमें सुनील कुमार, बालमुकुंद यादव, राजू कुमार, धर्मेंद्र पासवान और नंदन यादव शामिल थे। शेखपुरा की ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2019 में इन सभी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। अदालत ने उस समय प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर यह फैसला दिया था।
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों पर जताई गंभीर आपत्ति
हाईकोर्ट में अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पूरा मामला तथाकथित डाइंग डिक्लेरेशन पर आधारित था, जिसे न तो मूल रूप में पेश किया गया और न ही किसी स्वतंत्र गवाह से इसकी पुष्टि कराई गई। अदालत ने पाया कि जिस बयान को अहम साक्ष्य बताया गया, वह वास्तव में पुलिस अधिकारी द्वारा तैयार किया गया पुनर्लेखन था। इसके अलावा, पुलिस के समक्ष दिए गए कथित कबूलनामे को भी वैध साक्ष्य नहीं माना जा सकता।
ट्रायल जज की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि इस तरह की त्रुटियां न्यायिक प्रक्रिया की गंभीरता को प्रभावित करती हैं। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के जज के फैसले और साक्ष्यों के मूल्यांकन पर असंतोष जताया। इसी के साथ उन्हें आपराधिक मामलों की सुनवाई से अलग करने का निर्देश दिया गया है और उनके लिए विशेष प्रशिक्षण की सिफारिश भी की गई है, ताकि भविष्य में ऐसी चूक न हो।
न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर जोर
हाईकोर्ट का यह फैसला न्यायिक प्रणाली में साक्ष्यों की विश्वसनीयता और प्रक्रिया की पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने से पहले ठोस और प्रमाणिक साक्ष्य होना आवश्यक है। केवल संदेह या अपूर्ण दस्तावेजों के आधार पर सजा देना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।



