WomenReservation – लोकसभा में महिला आरक्षण संशोधन बिल पर सियासी टकराव तेज
WomenReservation – पांच राज्यों में चुनावी माहौल के बीच बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक को लेकर जो घटनाक्रम सामने आया, उसने राजनीतिक बहस को और तीखा कर दिया है। देर रात तक चली चर्चा और सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करने के बाद उम्मीद थी कि विधेयक पारित हो जाएगा, लेकिन मतदान के दौरान यह लोकसभा में आवश्यक समर्थन हासिल नहीं कर सका। इसके तुरंत बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया।

विशेष सत्र और देर रात तक चली चर्चा
सरकार ने महिला आरक्षण संशोधन विधेयक 2023 और परिसीमन विधेयक 2026 सहित तीन महत्वपूर्ण प्रस्तावों पर विचार के लिए विशेष सत्र बुलाया था। पहले दिन की कार्यवाही आधी रात के बाद तक चली, जिसमें विभिन्न दलों के सांसदों ने अपनी-अपनी राय रखी। इस दौरान महिला प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत पर व्यापक सहमति दिखी, लेकिन विधेयक के स्वरूप और समयसीमा को लेकर मतभेद साफ नजर आए।
अधिसूचना के बाद भी नहीं मिल सका समर्थन
17 अप्रैल को सरकार ने महिला आरक्षण कानून को लागू करने की औपचारिक अधिसूचना जारी की। इसके बाद शाम को जब मतदान हुआ तो स्थिति सरकार के अनुमान के अनुरूप नहीं रही। संविधान संशोधन से जुड़े इस विधेयक को पारित कराने के लिए विशेष बहुमत जरूरी था, जो जुट नहीं पाया और प्रस्ताव गिर गया। इस नतीजे ने संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह हलचल बढ़ा दी।
सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप
विधेयक गिरने के बाद सत्तारूढ़ दल ने विपक्ष पर महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ खड़े होने का आरोप लगाया। वहीं विपक्षी दलों ने इसे सरकार की रणनीति पर सवाल उठाने का मौका बताया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने कहा कि यह पूरा घटनाक्रम एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, ताकि चुनावी माहौल में विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया जा सके।
विपक्ष ने संवाद की कमी उठाई
विपक्षी नेताओं का कहना है कि इतने महत्वपूर्ण संविधान संशोधन पर सरकार ने पर्याप्त संवाद नहीं किया। उनका तर्क है कि यदि सभी दलों को साथ लेकर चर्चा होती तो बेहतर सहमति बन सकती थी। उन्होंने यह भी कहा कि 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून को उसी रूप में लागू किया जाना चाहिए था, उसमें संशोधन की आवश्यकता स्पष्ट नहीं की गई।
सर्वदलीय बैठक को लेकर उठे सवाल
कांग्रेस नेताओं ने आरोप लगाया कि विपक्ष लगातार सर्वदलीय बैठक की मांग कर रहा था, लेकिन इस दिशा में पहल नहीं की गई। उनका कहना है कि अलग-अलग दलों से अलग-अलग बातचीत करने की कोशिश ने अविश्वास को और बढ़ाया। इस वजह से विधेयक पर व्यापक सहमति बन पाना मुश्किल हो गया।
मतदान के आंकड़े और विधेयक की स्थिति
लोकसभा में हुए मत विभाजन के दौरान कुल 528 सांसदों ने भाग लिया। इनमें से 298 सांसदों ने विधेयक के पक्ष में मतदान किया, जबकि 230 सांसद इसके विरोध में रहे। संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण इसे पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 352 वोटों की जरूरत थी, जो नहीं मिल सकी और प्रस्ताव गिर गया।
चुनावी राजनीति में मुद्दे की एंट्री
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस पूरे घटनाक्रम का असर आगामी चुनावों पर पड़ सकता है। महिला मतदाताओं को ध्यान में रखते हुए यह मुद्दा अलग-अलग राज्यों में प्रमुखता से उठाया जा सकता है। कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि चाहे विधेयक पारित होता या नहीं, दोनों ही परिस्थितियों में यह विषय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनना तय था।
आगे की रणनीति पर नजर
अब यह देखना अहम होगा कि सरकार इस विषय पर आगे क्या कदम उठाती है और क्या विपक्ष के साथ किसी नए फॉर्मूले पर सहमति बन पाती है। फिलहाल यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में है और आने वाले समय में इसके कई आयाम सामने आ सकते हैं।