बिहार

NEETCoaching – मेडिकल तैयारी के लिए कोटा जाने पर बढ़ रहा है खर्च

NEETCoaching – बिहार से हर साल बड़ी संख्या में छात्र मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए राजस्थान के कोटा शहर का रुख करते हैं। कोटा लंबे समय से देश के प्रमुख कोचिंग केंद्र के रूप में जाना जाता है, जहां बेहतर शैक्षणिक माहौल और प्रतियोगी तैयारी की सुविधाएं छात्रों को आकर्षित करती हैं। हालांकि अब वहां पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे मध्यमवर्गीय और ग्रामीण परिवारों पर आर्थिक दबाव भी बढ़ने लगा है।

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शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार बिहार से हर वर्ष लगभग 60 हजार छात्र केवल नीट परीक्षा की तैयारी के लिए कोटा पहुंचते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की होती है जो अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए बचत, कर्ज या जमीन बेचने तक का सहारा लेते हैं।

कोचिंग फीस सबसे बड़ा आर्थिक बोझ

कोटा के प्रमुख कोचिंग संस्थानों की फीस अब ढाई लाख से तीन लाख रुपये सालाना तक पहुंच चुकी है। यह खर्च अधिकांश परिवारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। इसके अलावा टेस्ट सीरीज, अलग अध्ययन सामग्री और डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म पर भी अतिरिक्त राशि खर्च करनी पड़ती है।

कई अभिभावकों का कहना है कि कोचिंग संस्थानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सीधा असर फीस पर दिखाई दे रहा है। बेहतर रिजल्ट और रैंकिंग के दावों के कारण छात्र महंगे संस्थानों में दाखिला लेने को प्राथमिकता देते हैं।

रहने और भोजन का खर्च भी लगातार बढ़ा

कोटा में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए हॉस्टल और पीजी का खर्च भी कम नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक रहने की व्यवस्था पर सालाना करीब डेढ़ लाख से दो लाख रुपये तक खर्च हो जाते हैं। इसके अलावा मेस और भोजन पर अलग से बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है।

छात्रों के अनुसार बढ़ती महंगाई के कारण रोजमर्रा की जरूरतें भी महंगी हो गई हैं। बिजली, इंटरनेट, परिवहन और अन्य दैनिक खर्च जोड़ने पर कुल बजट काफी बढ़ जाता है। कई परिवारों को हर महीने अतिरिक्त आर्थिक व्यवस्था करनी पड़ती है।

तकनीकी संसाधनों ने बढ़ाया अतिरिक्त खर्च

ऑनलाइन पढ़ाई और डिजिटल टेस्ट सिस्टम के बढ़ते इस्तेमाल ने छात्रों के लिए तकनीकी संसाधनों को जरूरी बना दिया है। मोबाइल फोन, लैपटॉप या टैबलेट जैसी चीजों पर भी परिवारों को अलग से निवेश करना पड़ रहा है। किताबों और अन्य अध्ययन सामग्री का खर्च भी लगातार बढ़ा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन सभी खर्चों को जोड़ने पर एक छात्र की सालाना तैयारी पर करीब सात लाख रुपये तक का खर्च पहुंच जाता है। ऐसे में कई परिवारों को आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ता है।

बिहार में कम खर्च लेकिन सीमित विकल्प

शिक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि बिहार में रहकर तैयारी करने पर खर्च अपेक्षाकृत कम हो सकता है। स्थानीय स्तर पर कोचिंग और रहने का खर्च कोटा की तुलना में कम पड़ता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में छात्र बाहर जाने को मजबूर हैं क्योंकि राज्य में अभी भी उच्च स्तर की तैयारी सुविधाओं और अनुभवी शिक्षकों की कमी महसूस की जाती है।

कई शिक्षाविदों का मानना है कि यदि बिहार में आधुनिक टेस्टिंग सिस्टम, गुणवत्तापूर्ण कोचिंग और बेहतर शैक्षणिक माहौल विकसित किया जाए तो छात्रों का पलायन कम किया जा सकता है।

शिक्षा के साथ आर्थिक पलायन का मुद्दा

अर्थशास्त्रियों के अनुसार यह केवल शिक्षा का मामला नहीं है, बल्कि बड़े पैमाने पर आर्थिक पलायन का उदाहरण भी है। बिहार से हर साल हजारों करोड़ रुपये दूसरे राज्यों के कोचिंग उद्योग में जा रहे हैं। अनुमान है कि यह राशि 4000 करोड़ रुपये से अधिक तक पहुंच रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इसी निवेश का उपयोग राज्य के भीतर शिक्षा ढांचे को मजबूत करने में किया जाए, तो स्थानीय स्तर पर भी बेहतर अवसर तैयार किए जा सकते हैं। इससे छात्रों को अपने राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सकेगी और परिवारों पर बढ़ता आर्थिक दबाव भी कम होगा।

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